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वित्तीय संकट गहराया: सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार लेगी 700 करोड़ का नया कर्ज

पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिति को लेकर एक बड़ी खबर सामने आ रही है, जहां सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली राज्य सरकार पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। इसी क्रम में सरकार ने एक बार फिर से भारी-भरकम ऋण लेने का निर्णय लिया है।

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Ankit Yadav
30 अग 2026, 16:39
वित्तीय संकट गहराया: सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार लेगी 700 करोड़ का नया कर्ज
हिमाचल प्रदेश में आर्थिक प्रबंधन और राजकोषीय घाटे को लेकर चिंताएं एक बार फिर से गहराने लगी हैं। राज्य की सुखविंदर सरकार ने अपने विकास कार्यों और दैनिक प्रशासनिक खर्चों को पूरा करने के लिए एक बार फिर से बाजार से उधार लेने का रास्ता चुना है। ताजा जानकारी के अनुसार, सरकार जल्द ही सात सौ करोड़ रुपये का नया कर्ज लेने जा रही है, जिससे राज्य के कुल कर्ज के आंकड़ों में और अधिक इजाफा होना तय है। लगातार बढ़ते ऋण के इस दौर से पहाड़ी राज्य के खजाने पर पड़ने वाले दबाव को लेकर राजनीतिक गलियारों में भी चर्चाएं तेज हो गई हैं।

बढ़ता वित्तीय दबाव और प्रशासनिक जरूरतें

सरकार की ओर से उठाए जा रहे इस कदम के पीछे कई तरह की आर्थिक मजबूरियां बताई जा रही हैं। राज्य में चल रही विभिन्न विकास परियोजनाओं, कर्मचारियों के देयकों और अन्य जरूरी खर्चों को संतुलित करने के लिए धन की आवश्यकता बनी रहती है। हालांकि, विपक्ष लगातार इस बात को लेकर सत्ता पक्ष पर हमलावर रहा है कि कर्ज लेने की इस प्रवृत्ति से राज्य की अर्थव्यवस्था आने वाले समय में गंभीर संकट में फंस सकती है। वित्तीय विशेषज्ञों का भी मानना है कि यदि समय रहते राजस्व बढ़ाने के ठोस उपाय नहीं किए गए, तो इस प्रकार के ऋण राज्य की वित्तीय सेहत के लिए दीर्घकालिक चुनौती बन सकते हैं। पूर्ववर्ती सरकारों के समय से चले आ रहे कर्ज के बकाए और वर्तमान देनदारियों के बीच, सुक्खू सरकार के लिए बजट प्रबंधन एक कड़ी परीक्षा साबित हो रहा है। राज्य सरकार को एक तरफ जहां सामाजिक कल्याण योजनाओं और बुनियादी ढांचे के विकास के वादों को पूरा करना है, वहीं दूसरी तरफ बढ़ते राजकोषीय घाटे पर भी लगाम कसनी है। इस सात सौ करोड़ रुपये के नए लोन के बाद राज्य पर कुल देनदारियों का बोझ और अधिक भारी हो जाएगा, जिसका सीधा असर भविष्य के वित्तीय बजट और योजनाओं पर पड़ सकता है। आने वाले दिनों में इस नए ऋण को लेकर विधानसभा के भीतर और बाहर राजनीतिक सरगर्मी बढ़ने के पूरे आसार हैं। विपक्षी दल इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाकर सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल खड़े कर सकते हैं। वहीं, आम जनता की निगाहें भी इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इस बढ़ते कर्ज के बोझ के बीच किस प्रकार राज्य की आर्थिकी को पटरी पर रखती है और जनता को राहत प्रदान करती है।
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