दियारा क्षेत्र में पुलिस की दबिश और गिरफ्तारी
मुंगेर के दियारा इलाके में स्थानीय पुलिस ने एक बड़ी सफलता हासिल करते हुए तीन संदिग्धों को दबोचने का काम किया है। पकड़े गए लोगों की पहचान विजय सिंह और भरत सिंह के रूप में हुई है, जबकि तीसरा व्यक्ति विशो मंडल है जो मौके पर एक स्थानीय कारीगर के तौर पर हथियार की मरम्मत का काम कर रहा था। पुलिस ने इनके कब्जे से एक प्रतिबंधित थ्री नॉट थ्री राइफल बरामद की है जिसके बाद इलाके में हड़कंप मच गया है। खुफिया सूत्रों से मिली जानकारी के आधार पर यह पूरी कार्रवाई अंजाम दी गई है। शुरुआती जांच में सामने आया है कि यह खतरनाक हथियार किसी बड़ी आपराधिक साजिश का हिस्सा हो सकता है। पुलिस अधिकारियों ने इन तीनों आरोपियों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है ताकि इस अवैध धंधे में शामिल अन्य चेहरों बेनकाब किया जा सके। इलाके में सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक कड़ा कर दिया गया है ताकि किसी भी तरह की अप्रिय घटना को समय रहते रोका जा सके। स्थानीय थाने में इस संबंध में मामला दर्ज कर कानूनी प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ाई जा रही है।
हथियार की वैज्ञानिक जांच और पुलिस अधिकारियों की पड़ताल
पुलिस महकमे के उच्चाधिकारियों के अनुसार बरामद की गई इस राइफल को लेकर कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। प्रारंभिक आकलन संकेत देता है कि यह वही प्रतिबंधित असलहा है जिसे साल 2011 के दौरान माओवादी और अपराधी गुटों के बीच हुई भयंकर मुठभेड़ के वक्त लूट लिया गया था। हालांकि पुलिस प्रशासन ने अभी तक इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है और हर बिंदु पर बेहद बारीकी से छानबीन की जा रही है। मुंगेर के पुलिस अधीक्षक सैयद इमरान मसूद ने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि हथियार के गायब हुए मूल नंबर को दोबारा हासिल करने के लिए वैज्ञानिक तकनीकों का सहारा लिया जा रहा है। इस उद्देश्य के लिए फोरेंसिक साइंस लैब यानी एफएसएल के विशेष विशेषज्ञों की एक टीम को जांच कार्य में लगाया गया है ताकि बंदूक की सटीक वैज्ञानिक पहचान सुनिश्चित की जा सके। यह पता लगाने का प्रयास भी किया जा रहा है कि क्या ये तीनों गिरफ्तार व्यक्ति सीधे तौर पर उस पुराने आपराधिक सिंडिकेट का हिस्सा रहे हैं या फिर इन्होंने किसी अन्य माध्यम से यह खतरनाक हथियार हासिल किया था। जांच दल हर एक सबूत को सुरक्षित रख रहा है ताकि अदालत में पुख्ता चार्जशीट पेश की जा सके।
पंद्रह साल पुराना खूनी संघर्ष और नए सिरे से खुलती फाइलें
यह पूरा मामला वर्ष 2011 में हरिनमार दियारा क्षेत्र में गंगा नदी के जलकर यानी मछली पकड़ने के अधिकारों को लेकर उपजे भारी विवाद से जुड़ा हुआ है। उस दौर में वर्चस्व कायम करने की खातिर दो स्थानीय बाहुबली गुटों के बीच खूनी संघर्ष की शुरुआत हुई थी। अपनी ताकत बढ़ाने के लिए एक पक्ष ने भाकपा माओवादियों को इस लड़ाई में शामिल कर लिया था जिसके बाद अपराधी गिरोह और माओवादियों के बीच आमने-सामने की जंग छिड़ गई थी। उस ऐतिहासिक नरसंहार के दौरान लगभग आठ से दस माओवादियों के अलावा दो स्थानीय ग्रामीणों की भी निर्मम हत्या कर दी गई थी। साक्ष्यों को मिटाने के लिए मारे गए माओवादियों के शवों को गंगा नदी की उफनती हुई तेज धारा में बहा दिया गया था। उस खूनी संघर्ष की अवधि में उग्रवादियों के कई आधुनिक हथियार भी गायब हो गए थे जिन्हें अब इस हालिया बरामदगी से जोड़कर देखा जा रहा है। इस अवैध असलहे के हाथ लगने से पुलिस के सामने उस डेढ़ दशक पुराने बहुचर्चित हत्याकांड की कड़ियों को एक बार फिर से जोड़ने की मजबूत उम्मीद जग गई है।