महिलाओं के विरुद्ध अपराध पर तीखी प्रतिक्रिया बिहार की वर्तमान स्थिति को लेकर राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है क्योंकि हाल ही में आए बयानों के माध्यम से राज्य के भीतर घटित हो रहे गंभीर अपराधों पर खुलकर बात की गई है। एक सार्वजनिक मंच से अपनी बात रखते हुए प्रमुख राजनेता सुधाकर सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रदेश के भीतर कानून व्यवस्था का ढांचा पूरी तरह चरमरा चुका है और इसका सबसे बुरा असर महिलाओं की सुरक्षा पर पड़ रहा है। उनके अनुसार राज्य के विभिन्न जिलों से हर रोज छेड़छाड़ और दुष्कर्म जैसी अमानवीय घटनाएं सामने आ रही हैं जो किसी भी सभ्य समाज के लिए अत्यंत शर्मनाक स्थिति पैदा करती हैं। इस प्रकार के गंभीर मामलों में लगातार हो रही वृद्धि ने स्थानीय पुलिस प्रशासन की कार्यशैली और सुरक्षा दावों की पोल खोलकर रख दी है जिससे आम जनता विशेषकर महिलाओं और उनके परिजनों के मन में गहरा असुरक्षा का भाव घर करता जा रहा है। प्रशासनिक स्तर पर त्वरित और कड़े कदम न उठाए जाने के कारण अपराधियों के हौसले लगातार बुलंद होते जा रहे हैं और वे कानून के डर से पूरी तरह बेपरवाह नजर आ रहे हैं।
प्रशासनिक तंत्र और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर संकट किसी भी राज्य की प्रगति और सामाजिक समरसता के लिए यह अत्यंत आवश्यक होता है कि वहां की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चाक-चौबंद रहे ताकि हर नागरिक खुद को सुरक्षित महसूस कर सके। हालांकि मौजूदा समय में बिहार राज्य के भीतर जिस प्रकार के हालात लगातार बन रहे हैं वे इस बात का स्पष्ट संकेत देते हैं कि जमीनी स्तर पर पुलिसिंग और खुफिया तंत्र अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में कहीं न कहीं विफल साबित हो रहे हैं। जब राज्य के भीतर ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी चौराहों तक महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों का ग्राफ ऊपर की ओर जाने लगता है तो यह केवल एक आपराधिक समस्या नहीं बल्कि पूरे शासन तंत्र की विफलता का प्रतीक बन जाता है। इस तरह की घटनाओं के बार-बार पुनरावृत्ति होने के पीछे कई सामाजिक और प्रशासनिक कारण जिम्मेदार होते हैं जिनमें त्वरित न्याय मिलने में देरी और मामलों की कमजोर तफ्तीश मुख्य रूप से शामिल हैं। जब तक राज्य के भीतर कानून लागू करने वाली एजेंसियों को पूरी तरह स्वतंत्र और जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा तथा अपराधियों के मन में पुलिस का खौफ पैदा नहीं किया जाएगा तब तक इस प्रकार की वारदतों पर प्रभावी अंकुश लगा पाना बेहद कठिन कार्य साबित होगा।
राजनीतिक सरगर्मी और आगामी सुधार की उम्मीदें सुधाकर सिंह द्वारा उठाए गए इस गंभीर मुद्दे के बाद से राज्य की राजनीतिक फिजा में गर्माहट आ गई है और विपक्षी दलों को सरकार को घेरने का एक और बड़ा मौका मिल गया है। आने वाले दिनों में इस बात की पूरी संभावना है कि इस मामले को लेकर विधानसभा के भीतर और बाहर दोनों ही जगहों पर हंगामा देखने को मिलेगा तथा सरकार पर अपनी नीतियों की समीक्षा करने का भारी दबाव बनेगा। जनता के बीच से उठ रही इन आवाजों का असर यह हो सकता है कि पुलिस विभाग को अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करने के लिए मजबूर होना पड़े और संवेदनशील इलाकों में गश्त बढ़ाई जाए ताकि असामाजिक तत्वों पर नकेल कसी जा सके। इसके अलावा इस प्रकार की तीखी बहसों और बयानों से समाज के भीतर भी एक जनचेतना जागृत होती है जो महिलाओं के अधिकारों और उनकी सुरक्षा के मुद्दों को मुख्यधारा की राजनीति के केंद्र में ला खड़ा करती है। अंततः यह समय इस बात की मांग करता है कि सभी राजनीतिक दल आपसी मतभेदों को दरकिनार करते हुए राज्य की बेटियों की सुरक्षा के लिए एक ठोस और साझा कार्ययोजना तैयार करें ताकि बिहार को अपराध मुक्त और भयमुक्त बनाया जा सके।