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लंबित मामले: देश भर में छुआछूत के 891 मुकदमे अदालतों में अटके, आधे से अधिक सिर्फ उत्तर प्रदेश में

देशभर में छुआछूत और सामाजिक भेदभाव से जुड़े मामलों की धीमी रफ्तार पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हालिया आंकड़ों के अनुसार, देश की विभिन्न अदालतों में ऐसे 891 मुकदमे लंबे समय से लंबित पड़े हैं, जिनमें से आधे से ज्यादा अकेले उत्तर प्रदेश राज्य से संबंधित हैं।

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Ankit Yadav
05 सित 2026, 11:31
लंबित मामले: देश भर में छुआछूत के 891 मुकदमे अदालतों में अटके, आधे से अधिक सिर्फ उत्तर प्रदेश में
भारतीय न्याय प्रणाली में सामाजिक भेदभाव और छुआछूत से जुड़े अपराधों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। देश के विभिन्न हिस्सों में इस प्रकार के अपराधों के खिलाफ कानूनी लड़ाइयां वर्षों से अदालतों के चक्कर काट रही हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, पूरे देश में कुल 891 ऐसे मुकदमे लंबित हैं जिनका फैसला आना अभी बाकी है। इन आंकड़ों ने एक बार फिर इस बात पर बहस छेड़ दी है कि पीड़ित पक्षों को सामाजिक न्याय और कानूनी राहत मिलने में इतनी लंबी देरी क्यों हो रही है। न्याय मिलने की इस लंबी प्रक्रिया के कारण पीड़ितों का सिस्टम से भरोसा भी डगमगाने लगा है।

उत्तर प्रदेश की स्थिति और अन्य राज्यों का हाल

आंकड़ों पर गौर करें तो सबसे गंभीर स्थिति उत्तर प्रदेश की नजर आती है। देशभर में लंबित कुल 891 मामलों में से लगभग आधे यानी एक बहुत बड़ा हिस्सा सिर्फ उत्तर प्रदेश राज्य से ही है। राज्य के विभिन्न जिलों की अदालतों में ये मामले वर्षों से अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। इसके विपरीत, कुछ राज्यों में स्थिति अलग तस्वीर पेश करती है। उदाहरण के लिए, पड़ोसी राज्य उत्तराखंड से इस श्रेणी में एक भी मामला लंबित नहीं होने की बात सामने आई है, जो अपने आप में एक अलग प्रशासनिक या सामाजिक स्थिति को दर्शाता है। हालांकि, देश के बाकी राज्यों में भी इस तरह के मामलों की पेंडेंसी न्यायपालिका और कानून व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। ऐतिहासिक रूप से देश में समानता के अधिकार को सुनिश्चित करने और सामाजिक कुरीतियों को मिटाने के लिए कई कड़े कानून बनाए गए हैं। इसके बावजूद धरातल पर स्थिति पूरी तरह से सुधर नहीं पाई है। अदालतों में मुकदमों की भारी भीड़, गवाहों के मुकर जाने, जांच में देरी और प्रशासनिक सुस्ती के कारण मामलों का समय पर निस्तारण नहीं हो पाता है। कानूनी जानकारों का मानना है कि जब तक विशेष अदालतों का गठन करके इन मामलों की सुनवाई तेजी से पूरी नहीं की जाएगी, तब तक अपराधियों में कानून का डर पैदा करना मुश्किल होगा। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या इन मामलों में सजा का इंतजार कर रहे पीड़ितों को कभी न्याय मिल पाएगा। सामाजिक संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं लगातार यह मांग कर रहे हैं कि ऐसे संवेदनशील मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएं ताकि पीड़िदों को कम से कम समय में न्याय दिलाया जा सके। जब तक न्याय मिलने की प्रक्रिया तेज नहीं होगी, तब तक कानून का डर और सामाजिक समानता का सपना अधूरा ही रहेगा। सरकार और न्यायपालिका दोनों को मिलकर इस दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है ताकि लंबित मामलों के अंबार को खत्म किया जा सके।
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