नगर निगम के दावों की खुली पोल अयोध्या नगर निगम क्षेत्र के अंतर्गत वेक्टर जनित बीमारियों की रोकथाम और स्वच्छता के नाम पर रोजाना बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन कागजी दावों से कोसों दूर नजर आती है। ताजा मामला तब प्रकाश में आया जब कार्यालय या कार्यक्षेत्र में मच्छरों के प्रकोप से अत्यधिक परेशान होकर एक निगम कर्मचारी को खुद ही अपने हाथों में छिड़काव यंत्र उठाना पड़ा। विभाग द्वारा फॉगिंग और लार्वारोधी रसायनों के छिड़काव के लिए विशेष टीमों के गठन और उनके नियमित रूप से क्षेत्रों में सक्रिय रहने के दावे किए जाते हैं, परंतु जब खुद विभाग के भीतर तैनात एक कर्मचारी को इस तरह की बुनियादी समस्या से जूझने के लिए मजबूर होना पड़े, तो आम जनता की क्या स्थिति होगी इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। यह घटना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि उच्च अधिकारियों के निर्देश और मैदानी स्तर पर होने वाले क्रियान्वयन के बीच कितना बड़ा अंतर मौजूद है, जिससे आम नागरिकों के साथ-साथ खुद सरकारी कर्मी भी खासे प्रभावित हो रहे हैं।
स्वास्थ्य और स्वच्छता व्यवस्था पर संकट मौसम में बदलाव के साथ ही उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरी इलाकों में मच्छरों का आतंक तेजी से बढ़ जाता है, जिससे मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा हमेशा मंडराता रहता है। स्थानीय निकायों की यह नैतिक जिम्मेदारी होती है कि वे समय रहते अपने क्षेत्रों में रोगाणुनाशक दवाओं का छिड़काव करवाएं ताकि नागरिकों को संक्रमण से बचाया जा सके। हालांकि, बजट और संसाधनों की कोई कमी न होने के बावजूद प्रशासनिक सुस्ती और मॉनिटरिंग के अभाव के कारण अक्सर समय पर फॉगिंग नहीं हो पाती है। अयोध्या जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक और प्रशासनिक केंद्र में यदि नगर निगम के अपने परिसरों या आसपास के कार्यस्थलों पर कर्मचारियों को इस प्रकार की असुविधा का सामना करना पड़ता है, तो यह संपूर्ण प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर उंगली उठाता है। विभागीय अधिकारियों की उदासीनता के चलते न केवल स्वच्छता अभियान कागजों तक सीमित होकर रह जाते हैं, बल्कि जनता के स्वास्थ्य के साथ भी खिलवाड़ होता है, जिससे लोगों में भारी आक्रोश व्याप्त रहता है और वे अपनी शिकायतों के समाधान के लिए दर-दर भटकने को मजबूर होते हैं।
कार्रवाई और सुधार की बढ़ती मांग सामने आई इस घटना के बाद स्थानीय नागरिकों और बुद्धिजीवियों के बीच तीव्र प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है, तथा लोग संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं। इस प्रकार के मामलों से न केवल विभाग की छवि धूमिल होती है, बल्कि शासन की जनहितैषी योजनाओं की भी साख प्रभावित होती है। ऐसे में यह आवश्यक हो गया है कि उच्च स्तर के अधिकारी इस पूरे प्रकरण का संज्ञान लें और फॉगिंग टीमों की कार्यप्रणाली की पारदर्शी जांच कराएं ताकि भविष्य में इस तरह की लचर व्यवस्था की पुनरावृत्ति न हो सके। इसके साथ ही, नगर निगम के सभी वार्डों और दफ्तरों में रोस्टर के अनुसार नियमित रूप से छिड़काव अभियान चलाया जाना चाहिए ताकि मच्छरों के प्रकोप पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके। यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ यह असंतोष और अधिक उग्र रूप ले सकता है, जिससे विभाग के लिए असहज स्थिति पैदा हो सकती है और जनता का प्रशासनिक व्यवस्था से पूरी तरह विश्वास उठ सकता है।