बढ़ते अपराध के आंकड़े और हॉटस्पॉट जिले
बिहार राज्य के भीतर डिजिटल धोखाधड़ी से जुड़े अपराधों में लगातार इजाफा देखा जा रहा है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार साल 2025 के दौरान कुल 1,17,812 साइबर अपराध के मामले दर्ज किए गए थे। इसके बाद साल 2026 के आंकड़ों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया क्योंकि इस साल एक लाख चौदह हजार से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं। इन सभी मामलों की गंभीरता को देखते हुए राज्य के कुछ जिलों को साइबर अपराध का प्रमुख हॉटस्पॉट घोषित किया गया है। इन विशेष जिलों में पटना के अलावा नवादा, नालंदा और शेखपुरा के इलाके शामिल हैं जहाँ अपराधियों का जाल सबसे ज्यादा फैला हुआ है। इन क्षेत्रों में पुलिस विभाग लगातार अपनी नजर बनाए हुए है ताकि अवैध गतिविधियों पर लगाम लगाई जा सके। पटना के साइबर थाना की एसएचओ संगीता कुमारी ने इस पूरे मामले पर विस्तार से जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि कैसे बदमाश अलग-अलग तरीकों से आम नागरिकों को अपना निशाना बना रहे हैं। शहर के साथ-साथ अब ग्रामीण इलाकों में भी डिजिटल ठगी के मामलों में तेजी से वृद्धि दर्ज की जा रही है। पुलिस इन सभी चुनौतियों का सामना करने के लिए नई रणनीतियों पर काम कर रही है।
ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं का दुरुपयोग
ग्रामीण इलाकों में रहने वाले सीधे-साधे लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने का झांसा देकर बैंक खाते खुलवाए जा रहे हैं। पटना साइबर थाना की एसएचओ संगीता कुमारी ने खुलासा किया कि इन खातों का इस्तेमाल बाद में साइबर फ्रॉड के लिए किया जाता है। एक गांव की जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि एक महिला ग्रामीणों को तरह-तरह की योजनाओं का लालच देती थी। वह कभी शौचालय निर्माण तो कभी मुफ्त अनाज उपलब्ध कराने का झूठा वादा करके बैंक खाते खुलवाती थी। इन सभी खातों का नियंत्रण बाद में ठगों के पास चला जाता था जिनके जरिए अवैध रकम का लेन-देन किया जाता था। इसके अलावा आजकल निवेश के नाम पर होने वाली ठगी के मामले भी बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। ठग लोगों को कम समय में कई गुना मुनाफा कमाने का लालच देकर बड़ी रकम निवेश करवाते हैं। शुरुआत में छोटी राशि निवेश करवाकर पीड़ितों का भरोसा पूरी तरह जीत लिया जाता है। इसके बाद पीड़ित अधिक रिटर्न की उम्मीद में अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा लगातार निवेश करता जाता है। जब तक पीड़ित को अपने साथ हुई धोखाधड़ी का अहसास होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और वह अपनी शुरुआती पूंजी से कई गुना अधिक रकम गंवा चुका होता है।
जांच की चुनौतियां और पुलिस की नई सलाह
साइबर अपराधियों तक पहुंचना पुलिस के लिए आसान नहीं होता क्योंकि वे अक्सर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सिम कार्ड खरीदते हैं। ऐसी स्थिति में पुलिस अधिकारियों को आरोपितों तक पहुंचने के लिए सीधे बैंक खातों और पैसों के ट्रांजेक्शन को ट्रैक करना पड़ता है। जांच के दौरान पुलिस की सबसे पहली प्राथमिकता पीड़ित को अधिक से अधिक राहत दिलाना होती है। जिस अवैध रकम को समय रहते रोका जा सकता है या वापस लाया जा सकता है, उसके लिए तुरंत कानूनी और तकनीकी कार्रवाई शुरू कर दी जाती है। हर महीने लगभग एक सौ से डेढ़ सौ नई एफआईआर केवल साइबर अपराध से जुड़ी दर्ज की जा रही हैं। इनसे निपटने के लिए पुलिस को आधुनिक तकनीक और नए संसाधन भी मिल रहे हैं। इसके बावजूद अधिकारियों ने आम जनता को कड़ी चेतावनी दी है कि वे किसी भी आकर्षक ऑफर पर तुरंत भरोसा न करें। यदि कोई व्यक्ति दो हजार रुपये के निवेश पर दस हजार देने की बात कहे तो लोगों को पहले उसकी सच्चाई पर विचार करना चाहिए। इसके अलावा सोशल मीडिया पर अनजान लोगों की फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार करने से पहले उनकी प्रोफाइल की पूरी जांच कर लेनी चाहिए ताकि तस्वीरों के गलत इस्तेमाल से बचा जा सके।