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वैश्विक आकर्षण: बीआरआईसीएड्स समिट में मध्य प्रदेश की चार सौ साल पुरानी बाग प्रिंट और प्राकृतिक छपाई का जलवा

बीआरआईसीएड्स शिखर सम्मेलन के दौरान मध्य प्रदेश की पारंपरिक चार सौ साल पुरानी बाग प्रिंट कला को वैश्विक मंच पर विशेष पहचान मिली है, जहां विदेशी मेहमानों ने भी खुद अपने हाथों से इस प्राचीन प्राकृतिक छपाई तकनीक का अनुभव किया।

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Ankit Yadav
12 सित 2026, 11:55
वैश्विक आकर्षण: बीआरआईसीएड्स समिट में मध्य प्रदेश की चार सौ साल पुरानी बाग प्रिंट और प्राकृतिक छपाई का जलवा
हाल ही में आयोजित एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय बीआरआईसीएड्स शिखर सम्मेलन में भारतीय संस्कृति और पारंपरिक हस्तशिल्प ने दुनिया भर के दिग्गजों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। इस वैश्विक आयोजन के दौरान मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक एवं पारंपरिक कला विधा मानी जाने वाली चार सौ साल पुरानी बाग प्रिंट छपाई तकनीक को प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया। इस अनूठी पहल का मुख्य उद्देश्य भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक हथकरघा परंपराओं को अंतरराष्ट्रीय मंच पर बढ़ावा देना था, जिससे विदेशी प्रतिनिधियों को देश की कलात्मक गहराई से रूबरू होने का बेहतरीन अवसर प्राप्त हुआ।

विदेशी मेहमानों ने खुद की नेचुरल छपाई

शिखर सम्मेलन के दौरान एक विशेष लाइव प्रदर्शन का आयोजन किया गया था, जिसमें विदेशी मेहमानों और वैश्विक मंच के विशिष्ट अतिथियों ने केवल कारीगरों को देखने के बजाय खुद अपने हाथों से प्राकृतिक रंगों और ठप्पों का उपयोग करके छपाई की कला का आनंद लिया। प्रकृति के अनुकूल और जैविक रंगों से तैयार होने वाली इस पारंपरिक बाग प्रिंट की प्रक्रिया को देखकर विदेशी मेहमान खासे उत्साहित नजर आए। उन्होंने न केवल इस प्राचीन शिल्प की बारीकियों को समझा, बल्कि इसके पीछे की पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ उत्पादन शैली की भी खुलकर सराहना की। मध्य प्रदेश के आदिवासी और पारंपरिक शिल्प क्षेत्रों से जुड़ी यह कला सदियों से अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। इस प्रकार के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में इस तरह के हस्तशिल्प के प्रदर्शन से स्थानीय कारीगरों और बुनकरों को वैश्विक बाजार में नई पहचान मिलने की प्रबल संभावनाएं बढ़ जाती हैं। देश की सांस्कृतिक कूटनीति के लिहाज से भी इस आयोजन को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसके माध्यम से भारतीय पारंपरिक कलाओं के संरक्षण और उनके संवर्धन के प्रयासों को दुनिया भर में एक मजबूत संदेश मिला है। आने वाले समय में इस प्रकार के मंचों के माध्यम से भारतीय हथकरघा और लोक कलाओं को दुनिया के विभिन्न कोनों तक पहुंचाने के लिए और अधिक प्रभावी कदम उठाए जाने की उम्मीद है। देश के विभिन्न हिस्सों से आए ऐसे पारंपरिक शिल्प जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी चमक बिखेरते हैं, तो इससे न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संबल मिलता है, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान के नए रास्ते भी प्रशस्त होते हैं। विदेशी मेहमानों द्वारा दिखाई गई इस गहरी रुचि ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक युग में भी प्राचीन हस्तशिल्प और प्राकृतिक कलाओं के प्रति लोगों का आकर्षण कम नहीं हुआ है।
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