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रणनीतिक विरासत: झारखंड का छऊ नृत्य युद्ध के मैदानों से उपजा है जो बिना शब्दों के रामायण-महाभारत की कथाएं कहता है

झारखंड की सांस्कृतिक पहचान में विशेष स्थान रखने वाला 'छऊ नृत्य' अपनी प्राचीन युद्ध कला और अनूठी प्रस्तुति शैली के लिए जाना जाता है, जिसमें बिना किसी संवाद के पौराणिक कथाओं का मंचन किया जाता है।

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Kantap News डेस्क
19 अग 2026, 16:54
रणनीतिक विरासत: झारखंड का छऊ नृत्य युद्ध के मैदानों से उपजा है जो बिना शब्दों के रामायण-महाभारत की कथाएं कहता है
झारखंड की सांस्कृतिक धरोहर में 'छऊ नृत्य' का एक अत्यंत गौरवशाली और प्राचीन स्थान है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि इस पारंपरिक लोक नृत्य की जड़ें सीधे तौर पर सैनिकों के युद्ध अभ्यास और सैन्य तकनीकों से जुड़ी हुई हैं। प्राचीन काल में योद्धा अपनी शारीरिक दक्षता और युद्ध कौशल को बेहतर बनाने के लिए जिन अभ्यासों का उपयोग करते थे, वही समय के साथ कलात्मक रूप धारण कर इस खूबसूरत नृत्य शैली में ढल गए।

बिना शब्दों के बयां होती हैं महागाथाएं

इस लोक नृत्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें मंच पर अपनी बात कहने या कहानी समझाने के लिए किसी भी प्रकार के शब्दों या संवादों की आवश्यकता नहीं पड़ती है। कलाकार अपनी शारीरिक भंगिमाओं, मुद्राओं और विशेष मुखौटों के माध्यम से पूरी कहानी को दर्शकों तक पहुंचाते हैं।

रामायण और महाभारत का जीवंत मंचन

अपनी इसी अद्भुत संवादहीन शैली के जरिए छऊ नृत्य के कलाकार हिंदू धर्म के दो सबसे बड़े महाकाव्यों यानी रामायण और महाभारत से जुड़े विभिन्न प्रसंगों व कथाओं को बेहद खूबसूरती से जीवंत करते हैं। युद्ध के मैदान की ऊर्जा से निकला यह नृत्य आज देश और दुनिया भर में अपनी अनूठी पहचान बना चुका है और भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा को आज भी जीवंत रखे हुए है।
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