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अमेरिकी उच्च शिक्षा से मोहभंग: भारतीय छात्रों के आवेदनों में 15% की गिरावट, जानिए क्या हैं इसके पीछे के बड़े कारण
अमेरिका में उच्च शिक्षा हासिल करने की चाह रखने वाले भारतीय युवाओं के रुझान में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिकी विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए आवेदन करने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में लगभग 15 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
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Ankit Yadav
26 अग 2026, 11:17
विदेश जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करना हमेशा से भारतीय युवाओं और उनके परिवारों का एक बड़ा सपना रहा है। पारंपरिक रूप से अमेरिका को इस दिशा में सबसे प्रमुख और पसंदीदा गंतव्य माना जाता रहा है, जहां हर साल लाखों छात्र अपने भविष्य को संवारने के लिए पहुंचते हैं। हालांकि, हालिया समय में इस प्राथमिक आकर्षण में कमी आती हुई दिखाई दे रही है। सामने आए ताजा आंकड़ों के अनुसार, अमेरिकी संस्थानों में पढ़ने की इच्छा रखने वाले भारतीय छात्रों के आवेदनों में पंद्रह प्रतिशत की उल्लेखनीय गिरावट आई है।
वीज़ा के अलावा अन्य चिंताएं
इस भारी गिरावट के पीछे केवल वीज़ा मिलने में आने वाली बाधाएं या प्रक्रियागत जटिलताएं ही एकमात्र कारण नहीं हैं। जानकारों का मानना है कि इसके पीछे कई अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक और आर्थिक कारक भी जिम्मेदार हैं। बढ़ती हुई महंगाई, अमेरिकी विश्वविद्यालयों में आसमान छूती ट्यूशन फीस और पढ़ाई के बाद वहां के स्थानीय जॉब मार्केट में आने वाली मंदी या अनिश्चितता ऐसे तमाम पहलू हैं जो छात्रों और उनके अभिभावकों को गंभीर रूप से सोचने पर मजबूर कर रहे हैं। इसके अलावा, अन्य देशों द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में दिए जा रहे बेहतर और किफायती विकल्प भी छात्रों का ध्यान अपनी ओर खींच रहे हैं।
पूर्व वर्षों की तुलना में यह बदलाव काफी चौंकाने वाला है क्योंकि अमेरिका में डिग्री हासिल करने को वैश्विक करियर के लिहाज से सबसे सुरक्षित और बेहतरीन जरिया माना जाता था। लेकिन अब वहां के बदलते हालात और वित्तीय दबाव के कारण छात्रों का इस मोह से बाहर आना शुरू हो गया है। अभिभावक भी अब आंख मूंदकर भारी-भरकम कर्ज लेने से कतरा रहे हैं, क्योंकि पढ़ाई पूरी होने के बाद भी अमेरिका में एच-1बी वीज़ा और परमानेंट रेजिडेंसी यानी ग्रीन कार्ड के रास्ते बेहद कठिन और लंबी प्रतीक्षा वाले बने हुए हैं।
भविष्य के विकल्प और शिक्षा बाजार पर असर
भारतीय छात्रों के इस तरह रुख मोड़ने से केवल अमेरिका के विश्वविद्यालयों को ही आर्थिक झटका नहीं लग रहा है, बल्कि वैश्विक शिक्षा बाजार का संतुलन भी बदल रहा है। कई छात्र अब यूरोप, यूनाइटेड किंगडम, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की ओर अधिक रुचि दिखा रहे हैं, जहां वीज़ा नीतियां या तो अधिक अनुकूल हैं या फिर लागत कुछ हद तक नियंत्रण में है। आने वाले सत्रों में अमेरिकी संस्थानों को भारतीय छात्रों को आकर्षित करने के लिए अपनी नीतियों और छात्रवृत्ति कार्यक्रमों में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं, अन्यथा यह गिरावट और अधिक गहरी हो सकती है।