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बौद्धिक संपदा का संकट: आईआईटी बीएचयू में दो साल में 250 खोजों पर अधिकार मांगा लेकिन एक भी तकनीक का नहीं हुआ ट्रांसफर
आईआईटी बीएचयू में पिछले दो वर्षों के दौरान वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं द्वारा की गई ढाई सौ से अधिक नई खोजों के स्वामित्व अधिकार के लिए आवेदन किए गए हैं, हालांकि इस अवधि में एक भी तकनीक का वाणिज्यिक हस्तांतरण नहीं हो पाया है।
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Ankit Yadav
22 अग 2026, 14:34
देश के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों में शुमार भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) बीएचयू से जुड़ी एक चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। पिछले दो वर्षों के भीतर संस्थान के शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों और विद्यार्थियों ने अपनी नवाचारी खोजों के लिए स्वामित्व अधिकार यानी पेटेंट और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स हासिल करने के वास्ते लगभग ढाई सौ आवेदन दाखिल किए हैं। शैक्षणिक और शोध की दृष्टि से यह संख्या काफी उत्साहजनक मानी जा रही है, जो संस्थान में चल रहे तकनीकी अनुसंधान के उच्च स्तर को दर्शाती है।
तकनीक हस्तांतरण का शून्य आंकड़ा
हालांकि, इन तमाम खोजों और पेटेंट दावों के बीच एक चिंताजनक पहलू यह भी उभरकर सामने आया है कि इस दो साल की समयावधि में एक भी तकनीक का वास्तविक इंडस्ट्री या बाजार में ट्रांसफर नहीं हो सका है। अकादमिक जगत में पेटेंट की बढ़ती संख्या को एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जाता है, लेकिन जब तक वे तकनीकें उद्योगों तक नहीं पहुंचतीं और आम जनजीवन या व्यावसायिक उपयोग में नहीं लाई जातीं, तब तक उनका वास्तविक सामाजिक और आर्थिक प्रभाव सीमित ही रहता है। जानकारों का मानना है कि लैब से निकलकर तकनीक का बाजार तक पहुंचना यानी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर होना इनोवेशन चक्र का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, जो इस मामले में फिलहाल शून्य पर अटका हुआ है।
इस स्थिति के पीछे कई प्रकार की संरचनात्मक और व्यावहारिक चुनौतियां हो सकती हैं, जिन पर अब संस्थान के स्तर पर भी मंथन शुरू होने की उम्मीद है। आमतौर पर शैक्षणिक संस्थानों और उद्योग जगत के बीच समन्वय की कमी, कमर्शियल व्यवहार्यता का अभाव, और पेटेंट होने के बाद खरीदार या उद्यमी की तलाश में आने वाली अड़चनें इसके मुख्य कारण माने जाते हैं। आईआईटी जैसे प्रमुख संस्थानों में यदि बौद्धिक संपदा अधिकारों का सृजन बड़े पैमाने पर हो रहा है, तो उद्योग जगत के साथ उनकी साझेदारी को और अधिक मजबूत किए जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है ताकि इन खोजों को धरातल पर उतारा जा सके।
भविष्य की रणनीतियां और सुधार की उम्मीद
आने वाले समय में इस बात की पूरी संभावना है कि संस्थान अपने रिसर्च और डेवलपमेंट विंग के साथ-साथ इनक्यूबेशन सेंटर्स और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर ऑफिस की कार्यप्रणाली की समीक्षा करेगा। वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को केवल पेटेंट फाइल करने तक सीमित न रखकर, उनकी खोजों के व्यावसायीकरण के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने पर जोर दिया जा सकता है। सरकार और नीति निर्माता भी लगातार इस बात पर बल दे रहे हैं कि देश के उच्च शिक्षण संस्थानों के अनुसंधान सीधे तौर पर आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया जैसे अभियानों से जुड़ने चाहिए, जिससे स्थानीय उद्योगों को नई तकनीक का लाभ मिल सके।