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गंभीर संकट: नीति आयोग के अनुसार 8.7 करोड़ भारतीय युवा शिक्षा, रोजगार और कौशल प्रशिक्षण से हैं पूरी तरह दूर

नीति आयोग की एक हालिया रिपोर्ट में देश के युवाओं को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं, जिसके मुताबिक लगभग 8.7 करोड़ युवा ऐसे हैं जो न तो किसी शैक्षणिक संस्थान में पढ़ रहे हैं, न ही किसी नौकरी में हैं और न ही किसी प्रकार के व्यावसायिक प्रशिक्षण का हिस्सा बन रहे हैं।

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Ankit Yadav
23 अग 2026, 16:19
गंभीर संकट: नीति आयोग के अनुसार 8.7 करोड़ भारतीय युवा शिक्षा, रोजगार और कौशल प्रशिक्षण से हैं पूरी तरह दूर
देश के भविष्य और आर्थिक प्रगति को लेकर एक बेहद चिंताजनक तस्वीर नीति आयोग के आंकड़ों के जरिए सामने आई है। इस ताजा रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 8.7 करोड़ भारतीय युवा इन दिनों न तो औपचारिक शिक्षा का हिस्सा हैं, न ही उनके पास कोई आजीविका का साधन या नौकरी है और न ही वे किसी कौशल विकास या ट्रेनिंग प्रोग्राम से जुड़े हुए हैं। यह स्थिति देश की जनसांख्यिकीय लाभांश (डिमोग्राफिक डिविडेंड) की रणनीति के सामने एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है, क्योंकि इतनी बड़ी युवा आबादी का किसी भी उत्पादक गतिविधि में शामिल न होना देश के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने के लिए एक गंभीर चुनौती बन सकता है।

रोजगार और शिक्षा के मोर्चे पर चुनौतियां

बेरोजगारी और कौशल अंतराल हमेशा से देश के नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ा विषय रहे हैं। आधुनिक श्रम बाजार की मांग और युवाओं की शैक्षणिक योग्यताओं के बीच एक गहरी खाई लगातार बनी हुई है। जब देश के करोड़ों युवा न तो अध्ययनरत हैं और न ही कार्यशील हैं, तो यह सीधे तौर पर उनकी क्षमता के कम इस्तेमाल और भविष्य की अनिश्चितता को दर्शाता है। शिक्षा प्रणाली और औद्योगिक जरूरतों के बीच समन्वय की कमी के कारण इस वर्ग को मुख्यधारा से जोड़ना प्रशासन के लिए एक बड़ी प्राथमिकता बनता जा रहा है। सरकार और विभिन्न संस्थानों द्वारा कौशल विकास के तमाम दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर एक बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी इन योजनाओं के लाभ से वंचित नजर आ रहा है। आर्थिक जानकारों का मानना है कि यदि इस विशाल युवा शक्ति को सही दिशा में प्रशिक्षित नहीं किया गया, तो यह देश की उत्पादकता पर नकारात्मक असर डाल सकती है। भारत जैसे युवा देश में जहां कार्यशील आबादी का अनुपात सबसे अधिक है, वहां इस प्रकार की निष्क्रियता आर्थिक विकास की गति को धीमा कर सकती है। जरूरत इस बात की है कि नीति निर्माताओं, शैक्षणिक संस्थानों और कॉर्पोरेट जगत को मिलकर एक ऐसा ठोस रोडमैप तैयार करना होगा जिससे इन युवाओं की पहचान करके उन्हें या तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जाए या फिर उनकी रुचि के अनुसार रोजगारपरक प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए।

आगे की रणनीति और सुधार के उपाय

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद अब देश भर में शिक्षाविदों और नीति विशेषज्ञों के बीच गहन मंथन शुरू हो चुका है। विभिन्न हलकों से यह मांग उठ रही है कि रोजगार सृजन की रफ्तार को तेज किया जाए और दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों तक शिक्षा तथा ट्रेनिंग सेंटर्स की पहुंच को सुगम बनाया जाए। आने वाले समय में सरकार इस दिशा में कुछ कड़े और बड़े कदम उठा सकती है ताकि इस जनसांख्यिकीय चुनौती को अवसर में बदला जा सके। अगर समय रहते इन 8.7 करोड़ युवाओं को मुख्यधारा में शामिल नहीं किया गया, तो देश के आर्थिक लक्ष्यों को हासिल करने में बड़ी बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।
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