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कोचिंग संकट: मुफ्त शिक्षा योजनाओं के नाकाम होने की पांच बड़ी वजहें सामने आईं
देशभर में चलाई जा रही मुफ्त कोचिंग योजनाओं को लेकर कई सवाल उठ खड़े हुए हैं। हाल ही में एक रिपोर्ट में इन योजनाओं के फेल होने के पीछे पांच प्रमुख कारणों का खुलासा किया गया है, जिस पर शिक्षा जगत में चर्चा शुरू हो गई है।
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Ankit Yadav
22 अग 2026, 11:32
देश भर के विभिन्न राज्यों और केंद्रीय स्तर पर गरीब तथा जरूरतमंद विद्यार्थियों के लिए मुफ्त कोचिंग योजनाएं शुरू करने का सिलसिला लगातार जारी रहता है। सरकार का मुख्य उद्देश्य यह होता है कि आर्थिक तंगी की वजह से कोई भी युवा प्रतिष्ठित परीक्षाओं की तैयारी से वंचित न रह जाए। हालांकि, ज़मीनी स्तर पर इन पहलों के परिणाम अक्सर उन उम्मीदों के मुताबिक नहीं आ पाते हैं, जिनका वादा शुरुआती दौर में किया जाता है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, मुफ्त कोचिंग प्रदान करने वाली ये योजनाएं अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में पूरी तरह सफल नहीं हो पा रही हैं और इनके पीछे कुछ गंभीर व अंदरूनी कारण छिपे हुए हैं।
बुनियादी ढांचे और संसाधनों की भारी कमी
इन योजनाओं के कमजोर प्रदर्शन के पीछे सबसे बड़ा कारण बुनियादी सुविधाओं का अभाव बताया गया है। कई बार नाममात्र के बजट और कागजी विज्ञापनों के सहारे योजनाएं तो शुरू कर दी जाती हैं, लेकिन वहां न तो बैठने की ढंग की व्यवस्था होती है और न ही आधुनिक डिजिटल टूल्स व अध्ययन सामग्री मिल पाती है। इसके अलावा, पढ़ाने वाले शिक्षकों की गुणवत्ता पर भी बड़ा सवालिया निशान रहता है। मानदेय कम होने या चयन प्रक्रिया पारदर्शी न होने के कारण कई केंद्रों पर योग्य और अनुभवी शिक्षकों का टिक पाना मुश्किल हो जाता है। इसका सीधा और नकारात्मक प्रभाव विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ता है, जो अंततः उन्हें बीच में ही कोचिंग छोड़ने या परीक्षा में असफल होने पर मजबूर कर देता है।
योजनाओं के क्रियान्वयन में प्रशासनिक लापरवाही
दूसरी बड़ी समस्या प्रशासनिक अमले की उदासीनता और निगरानी तंत्र का कमजोर होना है। योजनाएं बना तो दी जाती हैं, लेकिन उनका समय-समय पर मूल्यांकन करने वाला कोई जिम्मेदार प्राधिकारी नहीं होता। भ्रष्टाचार और लालफीताशाही के चलते फंड का सही उपयोग नहीं हो पाता है, जिससे छात्रों तक जरूरत की चीजें पहुंच ही नहीं पाती हैं। छात्रों की नियमित उपस्थिति दर्ज करने और उनके प्रदर्शन को ट्रैक करने का कोई वैज्ञानिक तरीका नहीं अपनाया जाता है, जिससे पूरी प्रणाली खानापूरी बनकर रह जाती है।
भविष्य की रणनीतियां और सुधार की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकारें इन कल्याणकारी योजनाओं को वास्तव में प्रभावी बनाना चाहती हैं, तो उन्हें जमीनी हकीकत को ध्यान में रखकर नीतिगत बदलाव करने होंगे। सिर्फ कागजों पर आंकड़े दिखाने के बजाय वास्तविक परिणाम पर जोर देना होगा। छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए निजी संस्थानों के साथ पारदर्शी भागीदारी या डिजिटल माध्यमों का बेहतर उपयोग किया जाना चाहिए, ताकि हर जरूरतमंद युवा को उसका सही हक मिल सके।