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नैतिक शिक्षा की जरूरत: लखनऊ सहित पूरे देश में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर

देश और उत्तर प्रदेश की वर्तमान शैक्षणिक प्रणाली को लेकर एक बार फिर गंभीर वैचारिक बहस छिड़ गई है। जानकारों का मानना है कि केवल किताबी ज्ञान और डिग्रियां काफी नहीं हैं, बल्कि छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा का आधार पूरी तरह नैतिक होना चाहिए।

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Ankit Yadav
07 सित 2026, 11:38
नैतिक शिक्षा की जरूरत: लखनऊ सहित पूरे देश में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर
आज के दौर में अकादमिक सफलता और ऊंची डिग्रियां प्राप्त करने की अंधी दौड़ मची हुई है। लखनऊ और उत्तर प्रदेश के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में भी यही परिदृश्य देखने को मिलता है, जहां युवा केवल अंक लाने और परीक्षाएं पास करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। इस अंधी दौड़ में कहीं न कहीं मानवीय मूल्य, चरित्र निर्माण और नैतिक शिक्षा पीछे छूटती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक शिक्षा के मूल ढांचे में नैतिकता को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक एक जिम्मेदार और संवेदनशील समाज की कल्पना करना बेहद कठिन होगा।

बदलते परिवेश में संस्कारों की प्रासंगिकता

लखनऊ के शिक्षाविदों और विचारकों का लगातार यह कहना रहा है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ ने हमारी पारंपरिक शिक्षण पद्धतियों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। पहले के समय में गुरु-शिष्य परंपरा और नैतिक मूल्यों का पाठ प्राथमिक शिक्षा का अभिन्न हिस्सा हुआ करता था। लेकिन आज, तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा के बढ़ते प्रभाव के कारण नैतिक शिक्षा को हाशिये पर धकेल दिया गया है। परिणाम यह सामने आ रहा है कि युवा डिग्रियां हासिल करने के बाद भी समाज के प्रति अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों और मानवीय संवेदनाओं से दूर होते जा रहे हैं। पाठ्यक्रम में नैतिक मूल्यों का समावेश न केवल विद्यार्थियों को बेहतर इंसान बनाएगा, बल्कि उन्हें जीवन की कठिन परिस्थितियों से निपटने की आंतरिक शक्ति भी प्रदान करेगा। शैक्षणिक संस्थानों और नीति निर्माताओं के सामने आज यह सबसे बड़ी चुनौती है कि वे आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ-साथ प्राचीन भारतीय मूल्यों और नैतिक शिक्षा के बीच एक बेहतरीन संतुलन कैसे स्थापित करें। उत्तर प्रदेश के कई स्कूलों और कॉलेजों में इस दिशा में विचार-विमर्श शुरू हो चुका है कि कैसे पाठ्यक्रम को अधिक मूल्यपरक बनाया जाए। अभिभावकों का भी मानना है कि बच्चों में कम उम्र से ही बड़ों का आदर करना, सच्चाई के मार्ग पर चलना और समाज के प्रति सहानुभूति रखना सिखाया जाना चाहिए। यदि शिक्षण संस्थानों में नैतिक शिक्षा को अनिवार्य विषय के रूप में बढ़ावा दिया जाए, तो आने वाली पीढ़ी अधिक अनुशासित, जागरूक और राष्ट्र के प्रति समर्पित बनेगी। आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि सरकार और शिक्षा बोर्ड इस वैचारिक मंथन को जमीन पर उतारने के लिए क्या ठोस कदम उठाते हैं। लखनऊ और प्रदेश के अन्य प्रमुख शहरों में इस विषय पर संगोष्ठियों और सम्मेलनों का आयोजन किया जा रहा है, ताकि समाज के सभी वर्गों को इस गंभीर मुद्दे पर जोड़ा जा सके। शिक्षा व्यवस्था में नैतिक आधार का मजबूत होना केवल विद्यार्थियों के व्यक्तिगत विकास के लिए ही नहीं, बल्कि एक स्वस्थ, सशक्त और सुसंस्कृत राष्ट्र के निर्माण के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।
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