सर्वोच्च अदालत में नीट-यूजी परीक्षा लीक विवाद और उससे जुड़े छात्र आंदोलनों के दौरान सुरक्षा एजेंसियों द्वारा फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी (FRT) के कथित इस्तेमाल को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों के मौलिक अधिकारों और निजता की रक्षा के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में भाग लेने वाले अभ्यर्थियों और छात्रों के व्यक्तिगत डेटा, चेहरे की पहचान प्रणाली के रिकॉर्ड और सीसीटीवी फुटेज का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने पुलिस और जांच एजेंसियों को छात्रों के डेटा संग्रह और उसके रखरखाव में सख्त गोपनीयता बरतने के निर्देश दिए हैं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने तर्क दिया कि प्रतियोगी परीक्षा में न्याय की मांग कर रहे युवाओं पर पुलिस निगरानी तंत्र लागू करने से उनके भविष्य और करियर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का अधिकार मौलिक है और केवल आपराधिक जांच के नाम पर व्यापक स्तर पर छात्रों की डेटा प्रोफाइलिंग नहीं की जा सकती। न्यायमूर्ति की अध्यक्षता वाली पीठ ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सुरक्षा निगरानी के लिए पारदर्शी नीतियां बनाने का सुझाव दिया।
इस फैसले का देशभर के छात्र संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों ने स्वागत किया है। न्यायशास्त्रियों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह रुख प्रौद्योगिकी के दौर में नागरिकों के डिजिटल गोपनीयता अधिकारों को सुदृढ़ करेगा। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) और शिक्षा मंत्रालय ने भी अदालत को आश्वस्त किया है कि वे परीक्षा प्रक्रिया में सुधार के साथ-साथ छात्रों के कल्याण और निष्पक्ष मूल्यांकन के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।