देश के शैक्षणिक और अनुसंधान ढांचे को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने आज संसद के मानसून सत्र के दौरान बहुप्रतीक्षित 'राष्ट्रीय शोध फाउंडेशन (NRF) निधि विधेयक' को सदन के पटल पर रखा। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य देश भर के विश्वविद्यालयों, आईआईटी और अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में अनुसंधान संस्कृति को बढ़ावा देना और वैज्ञानिक खोजों के लिए वित्तीय बाधाओं को दूर करना है। सरकार का अनुमान है कि इस फाउंडेशन के माध्यम से अगले पांच वर्षों में देश के शोध और विकास क्षेत्र में सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों से भारी निवेश आकर्षित किया जाएगा, जिससे भारत को ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में शीर्ष देशों की श्रेणी में लाने में सीधी मदद मिलेगी।
फंडिंग और पारदर्शी आवंटन प्रक्रिया इस नए विधेयक की खास बात यह है कि इसमें अनुसंधान अनुदानों के आवंटन के लिए पूरी तरह से पारदर्शी और योग्यता-आधारित डिजिटल प्रणाली का प्रस्ताव किया गया है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने सदन में चर्चा के दौरान बताया कि एनआरएफ के तहत मिलने वाला फंड केवल पारंपरिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें सामाजिक विज्ञान, मानविकी, कला और भारतीय पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को भी समान प्राथमिकता दी जाएगी। इसके अलावा, देश के टियर-2 और टियर-3 शहरों के उन छोटे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को भी विशेष वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी जिनके पास अब तक अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं स्थापित करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं थे।
शैक्षणिक जगत और विशेषज्ञों की राय देश भर के प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों और आईआईटी निदेशकों ने सरकार के इस कदम की सराहना करते हुए कहा है कि यह भारतीय अनुसंधान तंत्र की तस्वीर पूरी तरह बदल देगा। हालांकि, विपक्षी दलों के कुछ सांसदों ने इस विधेयक पर चर्चा के दौरान यह चिंता भी जताई कि निधि के आवंटन में राज्यों के साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए और ग्रामीण क्षेत्रों के संस्थानों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। सत्र के दौरान इस विधेयक पर लंबी बहस होने की पूरी संभावना है, और शिक्षाविदों को उम्मीद है कि सर्वसम्मति से पारित होने के बाद यह कानून भारत को 'विश्व गुरु' और अनुसंधान का ग्लोबल हब बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।