अस्पताल परिसर में मरीज की मौत पर भारी हंगामा
बुधवार की देर शाम को बांका सदर अस्पताल के भीतर उस वक्त कोहराम मच गया जब वहां उपचाराधीन एक वृद्ध व्यक्ति की सांसें थम गईं। जान गंवाने वाले व्यक्ति की पहचान बौंसी थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले पंडा टोला के रहने वाले 59 वर्ष के मनोहर मंडल के रूप में की गई है। इस घटना के सामने आने के बाद उनके साथ आए लोग और परिवार के सदस्य बुरी तरह आक्रोशित हो उठे। उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था और अस्पताल में तैनात अमले पर अपनी भड़ास निकाली। देखते ही देखते चिकित्सालय के भीतर भारी गहमागहमी और तनाव का माहौल उत्पन्न हो गया। इस दौरान वहां मौजूद लोगों और तीमारदारों के बीच अफरातफरी का आलम कुछ देर तक लगातार बना रहा। परिवार के सदस्यों का कहना था कि अस्पताल के भीतर दाखिल किए जाने के बाद से ही मरीज की हालत को लेकर लापरवाही बरती गई। सुबह के लगभग 11.30 बजे के आसपास से उनकी शारीरिक स्थिति लगातार और अधिक गंभीर होती चली गई थी। किसी को भी उनकी सुधि लेने की फुर्सत नहीं मिली और अंततः उन्होंने दम तोड़ दिया। इस अचानक हुई मृत्यु से परिवार के लोग पूरी तरह टूट गए और अस्पताल प्रशासन के खिलाफ खुलकर अपना आक्रोश प्रकट करने लगे। उन्होंने अस्पताल के भीतर ही जमकर विरोध प्रदर्शन किया जिससे वहां की पूरी व्यवस्था कुछ देर के लिए पूरी तरह से लड़खड़ा गई और हर तरफ चीख-पुकार का माहौल देखने को मिला।
परिजनों ने लगाया डॉक्टरों पर गंभीर लापरवाही का इल्जाम
घटना के बाद मृतक के परिजनों ने सीधे तौर पर इलाज में गंभीर कोताही बरतने का आरोप चिकित्सकों के ऊपर मढ़ दिया। उनके मुताबिक अस्पताल में अलग-अलग समय पर डॉ संजय कुमार सुमन के साथ-साथ डॉ दिनकर झा और बालकृष्ण चौधरी ने मरीज की चिकित्सीय देखरेख की थी। परिजनों ने यह भी दावा किया कि जरूरत के समय कोई भी डॉक्टर मरीज के पास समय पर नहीं पहुंचा। जब उन्होंने डॉक्टरों से संपर्क करने और मरीज को देखने का आग्रह करने का प्रयास किया तो उन्हें डांटकर वहां से भगा दिया गया। तीमारदारों का आरोप है कि यदि समय रहते उचित और बेहतर इलाज मिल गया होता तो मरीज की जान नहीं जाती। इस बात से नाराज होकर उन्होंने सिविल सर्जन के कार्यालय में एक लिखित आवेदन भी सौंपा है। इस लिखित शिकायत के माध्यम से उन्होंने उन तीनों चिकित्सकों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई करने की पुरजोर मांग उठाई है जिन्होंने मरीज का उपचार किया था। इसके अलावा परिवार के लोगों ने शव का पोस्टमार्टम करवाने से भी साफ तौर पर इनकार कर दिया। उनका कहना था कि जब डॉक्टरों की कथित लापरवाही से मरीज की जान ही चली गई है तो अब पोस्टमार्टम कराने का कोई औचित्य नहीं बनता है। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान अस्पताल के भीतर काफी देर तक गहमागहमी का माहौल बना रहा और लोग अपनी मांगों पर अड़े रहे। प्रशासनिक अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर उन्हें समझाने की हरसंभव कोशिश की ताकि मामले को शांत कराया जा सके और अस्पताल का सामान्य कामकाज सुचारू रूप से फिर से बहाल किया जा सके।
प्रशासनिक हस्तक्षेप और मामले की जांच का ऐलान
अस्पताल परिसर में हंगामे और अफरातफरी की सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस बल फौरन मौके पर जा पहुंचा। इसके साथ ही अंचल अधिकारी प्रत्यक्ष कुमार भी घटनास्थल पर पहुंचे और आक्रोशित परिजनों को समझा-बुझाकर शांत कराने का प्रयास किया। अधिकारियों ने उन्हें आश्वासन दिया कि उनकी शिकायतों को पूरी गंभीरता से सुना जाएगा और नियमों के तहत उचित कदम उठाए जाएंगे। इस बीच सिविल सर्जन जितेंद्र कुमार सिंह ने मीडिया और अन्य लोगों के सामने इस पूरे मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इलाज में बरती गई कथित लापरवाही के इन तमाम आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष पुष्टि केवल गहन जांच के बाद ही हो सकेगी। इस संबंध में स्थिति का सच सामने लाने के लिए विभाग की ओर से एक विशेष जांच टीम का गठन किया जाएगा। सिविल सर्जन ने भरोसा दिलाया कि जांच प्रक्रिया के दौरान जो भी व्यक्ति दोषी पाया जाएगा, उसके विरुद्ध नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी। हालांकि अस्पताल प्रबंधन के इन बयानों के बावजूद परिजनों का गुस्सा पूरी तरह से शांत नहीं हुआ है और वे लगातार न्याय की गुहार लगा रहे हैं। इस घटना ने एक बार फिर सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली और डॉक्टरों के व्यवहार को लेकर कई तरह के गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में जांच टीम की रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि उपचार के दौरान वास्तव में किस स्तर पर चूक हुई थी और इसके लिए कौन जिम्मेदार था।