एक ही चिता पर अंतिम संस्कार
सिरोही जिले के ढाणी बंटाला और ढाणी गैनणों वाली क्षेत्र में एक अत्यंत मार्मिक घटनाक्रम देखने को मिला है। स्थानीय निवासियों के अनुसार, दो धर्म बहनों ने एक साथ दुनिया को अलविदा कह दिया। इन दोनों महिलाओं का अंतिम संस्कार एक ही चिता पर संपन्न किया गया, जिसने पूरे इलाके को शोक में डुबो दिया है। इस दुखद अवसर पर उपस्थित सभी लोगों की आंखें नम थीं क्योंकि उन्होंने दशकों पुराने आपसी प्रेम और अटूट रिश्ते को अंतिम संस्कार के दौरान भी जीवित देखा। यह घटना उस समय प्रकाश में आई जब सुरजी देवी और माली देवी, जो आपस में धर्म की बहनें थीं, का देहांत हुआ। स्थानीय समाज के बीच यह एक अनोखा उदाहरण बना है, जहां अटूट बंधन को मृत्यु के बाद भी निभाया गया। परिवार के सदस्य, भागीरथ गैनण और गिगराज चाहर ने घटना की जानकारी देते हुए बताया कि यह समय उनके लिए अत्यंत कठिन और कष्टदायक है, फिर भी उन्होंने अपनी दोनों बुजुर्गों को पूरे विधि-विधान और एक साथ विदाई देना ही उचित समझा।
बीमारी और दुखद निधन का विवरण
घटना की शुरुआत 83 वर्षीय सुरजी देवी की अस्वस्थता से हुई। उन्हें पिछले 15 दिनों से उपचार हेतु चौमूं के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां डॉक्टर लगातार उनके स्वास्थ्य में सुधार का प्रयास कर रहे थे। शनिवार की रात सुरजी देवी ने इलाज के दौरान अंतिम सांस ली। इस दुखद समाचार की जानकारी जैसे ही उनकी धर्म बहन 85 वर्षीय माली देवी को प्राप्त हुई, उन्हें गहरा आघात लगा। इस मानसिक और भावनात्मक झटके के कारण माली देवी की शारीरिक स्थिति अचानक बिगड़ने लगी। परिजन बिना समय गंवाए उन्हें तुरंत सिरोही के चिकित्सालय लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने उनकी स्थिति को देखते हुए उपचार का प्रयास किया। हालांकि, उन्हें आगे के इलाज के लिए सीकर ले जाया जा रहा था, लेकिन दुर्भाग्य से रास्ते में ही हृदय गति रुक जाने यानी हार्ट अटैक के कारण माली देवी का भी निधन हो गया। सुरजी देवी और माली देवी का जीवन एक-दूसरे से पूरी तरह जुड़ा रहा था, जिसकी परिणति उनके एक साथ अंतिम संस्कार के रूप में हुई।
अटूट रिश्ते की अनूठी मिसाल
सिरोही के इन दो गांवों की यह घटना मानवता और गहरे मानवीय रिश्तों का प्रतीक मानी जा रही है। आमतौर पर अंतिम संस्कार अलग-अलग होते हैं, लेकिन धर्म बहनों के बीच के इस गहरे जुड़ाव ने समाज को एक नई सीख दी है। परिवार के लोगों ने बिना किसी हिचकिचाहट के निर्णय लिया कि दोनों बहनों को एक ही चिता पर विदाई दी जाएगी ताकि उनका साथ जन्म-जन्मांतर तक कायम रहे। इस निर्णय को स्थानीय लोगों ने भी सराहा और बड़ी संख्या में उपस्थित होकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। यह घटना स्पष्ट करती है कि खून के रिश्तों से इतर, धर्म की बहनें भी एक-दूसरे के प्रति कितनी समर्पित हो सकती हैं। अब परिवार के लोग इन दोनों के जाने के बाद शोक सभाओं और अंतिम अनुष्ठानों की तैयारी में जुटे हैं। इस दुखद प्रसंग ने यह भी साबित कर दिया है कि आत्मीयता का बंधन भौतिक जगत से परे जाकर भी किस तरह कार्य करता है, जो अब स्थानीय स्मृति में एक स्थाई स्थान ले चुका है।