मेले में विद्यार्थियों की अनूठी सहभागिता
जोधपुर के कमला नेहरू नगर क्षेत्र में संचालित दिल्ली पब्लिक प्राइमरी स्कूल के बच्चे हाल ही में एक शैक्षिक और सांस्कृतिक गतिविधि का हिस्सा बने। इस शिक्षण संस्थान के कक्षा 2 से 5 तक के सभी विद्यार्थी शहर के मसूरिया पहाड़ी इलाके की ओर रवाना हुए। उस निर्धारित स्थान पर वीर दुर्गादास मेमोरियल पार्क स्थित था, जहाँ एक विशेष बाल मेले का आयोजन किया जा रहा था। उस मेले के प्रांगण में इन सभी छात्र-छात्राओं ने अत्यंत उत्साह के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और विभिन्न गतिविधियों में भाग लिया। बच्चों ने वहाँ पहुँचकर सबसे पहले कठपुतली संचालन की पुरानी और मनोरंजक कला के बारे में जानकारी हासिल की। इसके अलावा उन्होंने पारंपरिक ताल वाद्य यंत्रों को बजाने का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। मेले में उपस्थित प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन में इन विद्यार्थियों ने ढोलक और खड़ताल जैसे प्रसिद्ध लोक वाद्यों को अपने हाथों से बजाना सीखा। इस प्रकार जोधपुर के उस प्रसिद्ध पार्क में आयोजित हुए बाल मेले के दौरान छोटे बच्चों ने राजस्थान की संस्कृति से जुड़े कई नए और रचनात्मक कौशल सीखे।
लोक नृत्य और कलाओं का प्रशिक्षण
मेले के दौरान बच्चों को केवल वाद्य यंत्रों तक ही सीमित नहीं रखा गया बल्कि उन्हें विभिन्न पारंपरिक नृत्यों से भी रूबरू कराया गया। विद्यार्थियों ने राजस्थान की अमूल्य लोक कलाओं को अत्यंत करीब से देखा और उनकी बारीकियों को समझने का प्रयास किया। बच्चों ने घूमर नृत्य की शैली को बहुत ध्यान से देखा और उसके मूल स्वरूप को जाना। इसके साथ ही उन्होंने भवाई और कच्छी घोड़ी जैसी अत्यंत प्रसिद्ध और कठिन समझी जाने वाली लोक कलाओं की जानकारी भी प्राप्त की। मेले में मौजूद कुशल कलाकारों ने बच्चों को इन नृत्यों के इतिहास और उनकी प्रस्तुति के तरीकों के बारे में विस्तार से बताया। छोटे बच्चों ने अपनी जिज्ञासा दिखाते हुए कलाकारों से कई सवाल भी पूछे और इन कलाओं को सीखने में गहरी रुचि दिखाई। इस आयोजन ने बच्चों को किताबों से बाहर निकालकर व्यावहारिक रूप से अपनी सांस्कृतिक विरासत को अनुभव करने का एक सुनहरा अवसर प्रदान किया। सभी बच्चों ने इस बाल मेले में बहुत आनंद उठाया और विभिन्न कलाओं का अभ्यास करके अपने ज्ञान में वृद्धि की।
संस्कृति से जुड़ाव पर अधिकारियों के विचार
इस प्रकार के आयोजनों के महत्व को रेखांकित करते हुए विद्यालय प्रशासन से जुड़े प्रमुख पदाधिकारियों ने अपने महत्वपूर्ण विचार साझा किए। स्कूल के निदेशक डॉ। अभिमन्यु सिंह शेखावत ने इस बाल मेले की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रम बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए बहुत आवश्यक हैं। उन्होंने आगे बताया कि इस तरह के आयोजनों के माध्यम से छोटे विद्यार्थियों को अपनी संस्कृति और परंपराओं के साथ सीधे तौर पर जुड़ने का बहुमूल्य अवसर मिलता है। विद्यालय की उप प्रधानाचार्या लेफ्टिनेंट कर्नल चारु चौहान ने भी इस विचार का समर्थन किया और कहा कि आज की युवा पीढ़ी को अपनी मिट्टी की कलाओं से परिचित कराना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि जब बच्चे इस प्रकार की गतिविधियों में भाग लेते हैं तो उनके मन में अपनी प्राचीन धरोहर के प्रति सम्मान और प्रेम की भावना जागृत होती है। इन अधिकारियों का मानना था कि किताबी ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक और सांस्कृतिक शिक्षा भी बच्चों के भविष्य को संवारने में अहम भूमिका निभाती है। इस सफल आयोजन के बाद से इलाके में इस बात की चर्चा है कि भविष्य में भी ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रम बच्चों के लिए आयोजित किए जाने चाहिए।