भारतीय संसद के चल रहे मानसून सत्र के दौरान आज इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा 'राष्ट्रीय डिजिटल अधिकार और डेटा सुरक्षा विधेयक, 2026' को लोकसभा में पेश किया गया। इस नए विधेयक का मुख्य उद्देश्य देश के करोड़ों इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा करना और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। पिछले कई महीनों से इस मसौदे पर तकनीकी दिग्गजों, कानूनी विशेषज्ञों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया जा रहा था। आज जब इसे सदन में पटल पर रखा गया, तो विपक्ष के कुछ सदस्यों ने इस पर कुछ प्रावधानों को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर कीं, जिसके बाद सदन में तीखी बहस देखने को मिली।
नागरिकों की निजता और सोशल मीडिया जवाबदेही इस नए कानून के लागू होने के बाद टेक कंपनियों के लिए भारत में अपने नोडल अधिकारियों की नियुक्ति करना और स्थानीय डेटा स्टोरेज के नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य हो जाएगा। यदि कोई कंपनी यूजर्स के डेटा का दुरुपयोग करती पाई जाती है, तो उस पर भारी वित्तीय जुर्माने का प्रावधान किया गया है। सरकार का तर्क है कि डिजिटल युग में नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है और यह विधेयक उस दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा।
संयुक्त संसदीय समिति को भेजने की मांग विपक्षी दलों ने मांग की है कि इस संवेदनशील विधेयक को तुरंत पारित करने के बजाय गहन समीक्षा के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजा जाना चाहिए। हालांकि, सत्ता पक्ष का कहना है कि आज के साइबर युग में इस तरह के कानून का तुरंत लागू होना समय की मांग है। संसद के दोनों सदनों में इस विधेयक पर आने वाले दिनों में और लंबी चर्चा होने की संभावना है, जिस पर देश भर के तकनीकी और कानूनी विशेषज्ञों की पैनी नजर बनी हुई है।