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राजनीति

2027 से पहले मायावती का ‘मिशन यूपी’: बसपा की वापसी के लिए बिछने लगी सियासी बिसात

3 सितंबर की लखनऊ बैठक में संगठन की होगी गहन समीक्षा, PDA पर सपा को घेरने की तैयारी; दलित आधार के साथ सर्वसमाज और युवा वोटरों को साधने की रणनीति पर मंथन

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27 अग 2026, 14:50
2027 से पहले मायावती का ‘मिशन यूपी’: बसपा की वापसी के लिए बिछने लगी सियासी बिसात

Lucknow Desk : उत्तर प्रदेश की सियासत में विधानसभा चुनाव 2027 का रण भले अभी दूर हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने इसकी तैयारियां तेज कर दी हैं। कभी प्रदेश की सत्ता पर पूर्ण बहुमत के साथ काबिज रही बहुजन समाज पार्टी (बसपा) भी अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस हासिल करने की कवायद में जुटी है। पार्टी सुप्रीमो मायावती ने 3 सितंबर को लखनऊ में देशभर के वरिष्ठ पदाधिकारियों की बैठक बुलाई है। ऐसे में इस बैठक को बसपा की आगामी चुनावी रणनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बैठक में विभिन्न राज्यों के प्रभारी, उत्तर प्रदेश के मंडल और जिला स्तर के पदाधिकारी तथा संगठन से जुड़े वरिष्ठ नेता शामिल होंगे। माना जा रहा है कि इसमें पार्टी के मौजूदा संगठनात्मक ढांचे की समीक्षा के साथ-साथ जमीनी स्तर पर जनाधार बढ़ाने की रणनीति पर विस्तार से चर्चा होगी। बूथ स्तर पर पार्टी की स्थिति क्या है, किन क्षेत्रों में संगठन कमजोर हुआ है और किन सामाजिक वर्गों में बसपा का प्रभाव कम हुआ है—इन सभी मुद्दों पर मंथन की संभावना है। संगठन की मजबूती पर मायावती का फोकसबसपा के सामने 2027 से पहले सबसे बड़ी चुनौती अपने संगठन को फिर से सक्रिय करने की है। पार्टी की कोशिश है कि बूथ से लेकर जिला स्तर तक संगठन को मजबूत किया जाए और ऐसे स्थानीय चेहरों को चुनावी जिम्मेदारियां दी जाएं, जिनकी क्षेत्र में पकड़ मजबूत हो। मायावती पहले ही संकेत दे चुकी हैं कि पार्टी गठबंधन की राजनीति से दूरी बनाए रखकर अपने दम पर चुनाव लड़ने की दिशा में आगे बढ़ेगी। उत्तर प्रदेश समेत उन राज्यों में जहां आने वाले समय में चुनाव होने हैं, बसपा अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान और वोट आधार को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी के लिए यह रणनीति इसलिए भी अहम है क्योंकि उसका लक्ष्य महज चुनाव मैदान में उतरना नहीं, बल्कि अपने पारंपरिक मतदाताओं को फिर से संगठित करना है। इसके लिए संगठनात्मक बैठकों, कार्यकर्ता सम्मेलनों और जमीनी स्तर पर संपर्क अभियान को खास महत्व दिया जा रहा है। दलित आधार से आगे ‘सर्वसमाज’ पर नजरबसपा की राजनीति का सबसे मजबूत आधार लंबे समय से दलित मतदाता रहे हैं। हालांकि 2027 के लिए पार्टी अपनी रणनीति को केवल पारंपरिक वोट बैंक तक सीमित रखने के बजाय व्यापक सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश करती दिखाई दे रही है। दलितों के साथ ब्राह्मण, पिछड़े और अन्य सामाजिक वर्गों को जोड़ने की कवायद बसपा की पुरानी ‘सर्वजन’ राजनीति की याद दिलाती है।

पार्टी का प्रयास है कि बदलते राजनीतिक माहौल में पुराने सोशल इंजीनियरिंग मॉडल को नए स्वरूप में फिर से मजबूत किया जाए। यही वजह है कि संगठन में अलग-अलग सामाजिक समूहों की भागीदारी बढ़ाने और स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली चेहरों को सक्रिय करने पर जोर दिया जा रहा है। अगर बसपा अपने पारंपरिक दलित आधार के साथ दूसरे सामाजिक वर्गों का समर्थन जुटाने में सफल होती है तो 2027 के चुनाव में वह मुकाबले को प्रभावित करने की स्थिति में आ सकती है। PDA के ‘P’ पर सियासी संग्रामइस बीच समाजवादी पार्टी के PDA फॉर्मूले को लेकर भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में बयानबाजी तेज है। सपा PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के सामाजिक समीकरण को अपनी राजनीति का अहम आधार बना रही है। वहीं मायावती ने PDA के ‘P’ को लेकर सपा पर निशाना साधा है। मायावती का आरोप है कि सपा राजनीतिक लाभ के लिए PDA के ‘P’ को ‘पिछड़ा’ के बजाय ‘पंडित’ यानी ब्राह्मण के अर्थ में पेश करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने इसे अवसरवादी राजनीति और जनता को भ्रमित करने वाला राजनीतिक दांव बताया है। इस बयान को महज जुबानी हमला नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों की लड़ाई के तौर पर भी देखा जा रहा है। सपा जहां PDA के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को एकजुट करने की कोशिश कर रही है, वहीं बसपा इस समीकरण में अपने लिए राजनीतिक जगह तलाश रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में दोनों दलों के बीच सामाजिक प्रतिनिधित्व और वोट बैंक को लेकर राजनीतिक टकराव और तेज हो सकता है। मिश्रा और आकाश आनंद की भूमिका अहम2027 की तैयारियों में बसपा के भीतर अनुभवी और युवा नेतृत्व की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहने वाली है। पार्टी के वरिष्ठ नेता सतीश चंद्र मिश्रा को संगठनात्मक और राजनीतिक मामलों में अहम जिम्मेदारियां दी गई हैं। कानूनी, मीडिया और चुनाव आयोग से जुड़े मामलों में उनका अनुभव पार्टी के लिए उपयोगी माना जाता है। दूसरी ओर आकाश आनंद को युवा चेहरे के तौर पर आगे बढ़ाने की रणनीति भी नजर आ रही है। पार्टी कार्यकर्ताओं और युवाओं के बीच उनकी सक्रियता बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। इससे संकेत मिलता है कि बसपा एक ओर अनुभवी नेतृत्व के अनुभव का इस्तेमाल करना चाहती है, वहीं दूसरी ओर नई पीढ़ी के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच मजबूत करने की तैयारी भी कर रही है।

9 अक्टूबर का कार्यक्रम भी अहम3 सितंबर की बैठक के अलावा 9 अक्टूबर को लखनऊ में होने वाला कार्यक्रम भी बसपा की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। कांशीराम की पुण्यतिथि पर प्रस्तावित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं को जुटाने की तैयारी है। इसे केवल श्रद्धांजलि कार्यक्रम के तौर पर नहीं देखा जा रहा। पार्टी के लिए यह कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा करने, संगठन को सक्रिय करने और चुनाव से पहले अपनी राजनीतिक ताकत का संदेश देने का अवसर भी हो सकता है। ऐसे कार्यक्रमों के जरिए बसपा अपने कैडर को चुनावी मोड में लाने की कोशिश कर सकती है। मायावती के सामने बड़ी चुनौतीहालांकि बसपा की रणनीति स्पष्ट दिखाई देती है, लेकिन उसके सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। पिछले चुनावों में पार्टी के कमजोर प्रदर्शन के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मायावती अपने पुराने जनाधार को फिर से मजबूत कर पाएंगी। 2027 का विधानसभा चुनाव बसपा के लिए केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक अस्तित्व और प्रभाव को पुनर्स्थापित करने की चुनौती भी होगा। पार्टी को एक साथ कई मोर्चों पर काम करना होगा—संगठन मजबूत करना, पुराने मतदाताओं को सक्रिय करना, नए सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाना और युवाओं के बीच अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाना। मायावती का मौजूदा फॉर्मूला मोटे तौर पर चार प्रमुख बिंदुओं पर केंद्रित दिखाई देता है—अकेले चुनाव लड़ना, बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करना, दलित आधार के साथ सर्वसमाज को जोड़ना और अनुभवी व युवा नेतृत्व को सक्रिय करना। अब असली परीक्षा इन रणनीतियों को जमीन पर लागू करने की होगी। 3 सितंबर की बैठक में संगठन की दिशा तय हो सकती है, PDA पर मायावती के हमले से राजनीतिक संदेश पहले ही दिया जा चुका है और 9 अक्टूबर का कार्यक्रम कार्यकर्ताओं के बीच शक्ति प्रदर्शन का मंच बन सकता है। उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में भाजपा और सपा के बीच मुकाबले की चर्चा सबसे ज्यादा होती है, लेकिन बसपा की वापसी की कोशिश इस तस्वीर को बदल सकती है। सवाल यही है कि क्या मायावती 2027 में बसपा को फिर से उत्तर प्रदेश की राजनीति का निर्णायक खिलाड़ी बना पाएंगी? चुनावी रण अभी दूर है, लेकिन बसपा ने अपनी सियासी तैयारी का बिगुल जरूर बजा दिया है। अब नजर 3 सितंबर की बैठक पर है, जहां से मायावती के ‘मिशन यूपी’ की अगली तस्वीर सामने आ सकती है।

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