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सनातन और राजनीति: आस्था और वैचारिक दुष्चक्र पर शिक्षाविद् गीतांजलि जे. अंगमो के विचार

शिक्षाविद् गीतांजलि जे. अंगमो ने एक लेख में स्पष्ट किया है कि मूल समस्या सनातन धर्म में नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा इसके दोहन में है।

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Kantap News डेस्क
13 अग 2026, 16:58
सनातन और राजनीति: आस्था और वैचारिक दुष्चक्र पर शिक्षाविद् गीतांजलि जे. अंगमो के विचार
हाल ही में प्रकाशित एक आलेख में शिक्षाविद् गीतांजलि जे. अंगमो ने बहुत ही गहराई से इस बात का विश्लेषण किया है कि कैसे प्राचीन सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं को समकालीन राजनीतिक लाभ के लिए तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है। उनका कहना है कि सनातन धर्म जैसी महान परंपराएं हमेशा से सहिष्णुता, समावेशिता और ज्ञान का प्रतीक रही हैं, लेकिन चुनावी स्वार्थ के चलते इन्हें संकुचित दायरे में कैद करने का प्रयास किया जा रहा है। इस तरह की राजनीति से न केवल धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं, बल्कि समाज में अनावश्यक तनाव भी पैदा होता है।

धार्मिक प्रतीकों का राजनीतिकरण

लेख के अनुसार, जब राजनेता धार्मिक आस्थाओं को अपने राजनीतिक हथियारों के रूप में इस्तेमाल करते हैं, तो वे मूल आध्यात्मिक मूल्यों को दरकिनार कर देते हैं। इससे आम आस्तिक जनता के मन में यह भ्रम पैदा होता है कि धर्म अब आस्था का विषय न रहकर केवल सत्ता प्राप्ति का साधन बन गया है। बुद्धिजीवियों ने इस बात पर जोर दिया है कि धर्म और राजनीति का यह गठजोड़ समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। हमें यह समझने की जरूरत है कि सांस्कृतिक धरोहरें किसी एक दल या विचारधारा की बपौती नहीं होतीं, बल्कि वे पूरे राष्ट्र की साझी विरासत हैं।

सांस्कृतिक शुचिता और बौद्धिक स्वतंत्रता

इस वैचारिक संकट से उबरने के लिए यह जरूरी है कि समाज के प्रबुद्ध वर्ग आगे आएं और धार्मिक व आध्यात्मिक विमर्श को राजनीति के चंगुल से मुक्त कराएं। युवाओं को सही इतिहास और संस्कृति की जानकारी दी जानी चाहिए ताकि वे किसी भी प्रकार के राजनीतिक बहकावे में न आएं। जब तक धार्मिक मान्यताओं का सम्मान उनकी मूल भावना के साथ होता रहेगा, तब तक समाज में शांति और भाईचारा बना रहेगा।
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