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राजनीति

संसदीय समिति का गठन: विपक्ष के कड़े विरोध के बीच एफसीआरए बिल जेपीसी को भेजा गया

विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) से जुड़े नए संशोधन विधेयक को लेकर संसद में जोरदार हंगामा देखने को मिला, जिसके बाद इसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया।

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Kantap News डेस्क
13 अग 2026, 15:24
संसदीय समिति का गठन: विपक्ष के कड़े विरोध के बीच एफसीआरए बिल जेपीसी को भेजा गया
देश के विधायी गलियारों में उस समय सरगर्मी काफी बढ़ गई जब सरकार ने अत्यधिक संवेदनशील और विवादास्पद माने जाने वाले विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) से जुड़े संशोधन विधेयक को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। विपक्ष के कड़े प्रतिरोध और तीखी बहसों के बीच इस विधेयक को विस्तृत जांच-परख के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के हवाले कर दिया गया। विपक्षी दलों का आरोप है कि इस नए कानून के जरिए देश में सक्रिय विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों और विदेशी फंड से चलने वाली संस्थाओं की स्वतंत्रता को सीमित करने का प्रयास किया जा रहा है, जिसे लेकर सदन के भीतर और बाहर भारी नाराजगी देखने को मिली है।

विपक्ष की कड़ी मांग और सरकार का रुख

संसद के सत्र के दौरान विपक्षी सांसदों ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे दूरगामी परिणामों वाले कानूनों को जल्दबाजी में पारित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इस पर तमाम हितधारकों के साथ व्यापक मंत्रणा होनी चाहिए। सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए विदेशी निधियों के प्रवाह पर कड़ी निगरानी रखना समय की सबसे बड़ी मांग है। इसी गतिरोध को समाप्त करने और सभी पक्षों की आपत्तियों को दूर करने के लिए विधेयक को जेपीसी के पास भेजने का व्यावहारिक कदम उठाया गया ताकि समिति सभी पहलुओं का गहराई से अध्ययन कर अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंप सके।

समिति की समीक्षा और भविष्य की दिशा

अब सबकी निगाहें संयुक्त संसदीय समिति की कार्यप्रणाली और उसकी बैठकों पर टिकी हैं, जहां विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ, कानूनी सलाहकार और सामाजिक कार्यकर्ता अपने विचार और सुझाव प्रस्तुत करेंगे। जेपीसी के माध्यम से यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा कि कानून में खामियों को दूर किया जा सके और किसी भी प्रकार के संशय की गुंजाइश न बचे। हालांकि, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या समिति के भीतर सभी राजनीतिक दल आम सहमति बना पाते हैं या फिर रिपोर्ट पेश होने के बाद संसद के आगामी सत्रों में एक बार फिर से इसी मुद्दे पर तीखा राजनीतिक टकराव देखने को मिलेगा।
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