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राजनीति

वंदे मातरम पर सियासी संग्राम: केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कांग्रेस पर साधा निशाना, राष्ट्रीय गीत के अपमान का लगाया गंभीर आरोप

राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के गायन के दौरान कांग्रेस पार्टी के आचरण को लेकर देश की राजनीति में एक बार फिर भारी घमासान मच गया है, जिसमें केंद्रीय मंत्रियों ने विपक्षी दल पर तीखे हमले किए हैं।

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Kantap News डेस्क
17 अग 2026, 14:58
वंदे मातरम पर सियासी संग्राम: केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कांग्रेस पर साधा निशाना, राष्ट्रीय गीत के अपमान का लगाया गंभीर आरोप
देश के राष्ट्रीय गीतों और सांस्कृतिक प्रतीकों को लेकर राजनीतिक दलों के बीच तनातनी कम होने का नाम नहीं ले रही है। ताजा विवाद तब शुरू हुआ जब केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कांग्रेस पार्टी पर कड़ा प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि उनके नेता राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के सम्मान के प्रति उदासीन हैं। जोशी का कहना था कि जब सार्वजनिक आयोजनों के दौरान यह महान गीत गाया जाता है, तो विपक्षी नेताओं का आचरण देश की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय भावनाओं के अनुकूल नहीं होता है। इस बयान के सामने आते ही राजनीतिक गलियारों में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है और दोनों पक्षों के नेता एक-दूसरे पर राष्ट्रवाद विरोधी होने का ठप्पा लगाने में जुट गए हैं।

सांस्कृतिक मूल्यों और राजनीति की टकराहट

भारत के राजनीतिक परिदृश्य में राष्ट्रीय प्रतीकों का मुद्दा हमेशा से बेहद संवेदनशील रहा है। भाजपा नेताओं का आरोप है कि विपक्षी दल तुष्टिकरण की राजनीति के चलते देश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों का सम्मान करने से बचते हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए सत्ताधारी दल पर जनता का ध्यान असल मुद्दों से भटकाने का पुराना हथकंडा अपनाने का आरोप लगाया है। इस तीखी बयानबाजी के कारण संसद से लेकर सड़क तक सियासी पारा चढ़ गया है, और विभिन्न मंचों पर इस बात को लेकर बहस छिड़ गई है कि क्या राष्ट्रीय प्रतीकों को राजनीतिक बहसों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए या नहीं।

आम जनता की प्रतिक्रिया और भविष्य के आसार

इस प्रकार के विवादों से देश के सामाजिक ताने-बाने पर पड़ने वाले असर को लेकर बुद्धिजीवियों ने चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि स्वतंत्रता संग्राम के समय जिन गीतों और नारों ने पूरे देश को एक सूत्र में पिरोया था, उन्हें आज राजनीतिक लाभ-हानि का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए। हालांकि चुनावी माहौल को देखते हुए इस बात की पूरी संभावना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा और अधिक तूल पकड़ेगा। राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीतियों के तहत इस विवाद को हवा देने में लगे हुए हैं, जिससे यह साफ है कि आने वाले समय में राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़े ऐसे विषय राजनीति के केंद्र में बने रहेंगे।
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