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खेल नीति का संकट: हिमाचल में हरियाणा की तर्ज पर नीति लागू होने में क्यों आ रही बाधाएं
हिमाचल प्रदेश में हरियाणा की तर्ज पर नई खेल नीति तैयार करने की घोषणा की गई थी, लेकिन यह प्रक्रिया अभी तक विभिन्न प्रशासनिक और ढांचागत कारणों से रुकी हुई है, जिससे पहाड़ी राज्य के युवाओं की खेल प्रतिभा को आगे बढ़ाने का रास्ता प्रभावित हो रहा है।
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Ankit Yadav
29 अग 2026, 13:17
हिमाचल प्रदेश के प्रतिभाशाली युवाओं के सामने एक बार फिर से वही पुराना सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर राज्य में खेल प्रतिभाओं को उचित मंच और प्रोत्साहन क्यों नहीं मिल पा रहा है। कुछ समय पहले राज्य सरकार ने पड़ोसी राज्य हरियाणा की तर्ज पर एक आधुनिक और आकर्षक खेल नीति बनाने की घोषणा की थी। इस घोषणा से खेल प्रेमियों और उभरते हुए एथलीटों में भारी उत्साह देखा गया था, क्योंकि हरियाणा की खेल नीति को देश भर में खिलाड़ियों को मिलने वाले भारी नकद पुरस्कारों, सरकारी नौकरियों और विश्वस्तरीय सुविधाओं के लिए एक आदर्श माना जाता है। हालांकि, घोषणा के काफी समय बीत जाने के बाद भी यह फाइल कहां अटकी हुई है, इस पर सस्पेंस बना हुआ है और जमीनी स्तर पर कोई ठोस बदलाव देखने को नहीं मिला है।
पहाड़ी इलाकों में बुनियादी ढांचे की कमी
पर्वतीय क्षेत्रों में खेल संस्कृति को बढ़ावा देने के रास्ते में कई तरह की भौगोलिक और ढांचागत चुनौतियां हमेशा से बड़ी दीवार बनकर खड़ी रही हैं। समतल मैदानी इलाकों के विपरीत, हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्यों में बड़े खेल स्टेडियमों, आधुनिक इंडोर ट्रेनिंग सेंटर्स और हर मौसम में काम आने वाले खेल मैदानों का भारी अभाव है। हरियाणा ने अपने खिलाड़ियों के लिए जिस तरह का मजबूत बुनियादी ढांचा तैयार किया है, उसे हिमाचल जैसे आर्थिक रूप से सीमित संसाधनों वाले राज्य में लागू करना एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है। इसके अलावा, दूरदराज के ग्रामीण इलाकों से आने वाले गरीब और प्रतिभाशाली बच्चों के पास महंगे खेल उपकरण और उचित आहार खरीदने के लिए भी पर्याप्त वित्तीय साधन नहीं होते हैं, जिससे उनका कौशल बीच में ही दम तोड़ देता है।
प्रशासनिक सुस्ती और बजट का आवंटन भी इस पूरी प्रक्रिया में एक बड़ा अवरोध पैदा कर रहा है। नई खेल नीति को केवल कागजों पर तैयार करने के बजाय उसे धरातल पर उतारने के लिए करोड़ों रुपये के भारी-भरकम बजट की आवश्यकता होती है, जिसका प्रबंधन करना सरकार के लिए आसान नहीं दिख रहा है। खेल संघों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच बेहतर तालमेल की कमी के कारण नीतियां समय पर पास नहीं हो पाती हैं और फाइलें एक विभाग से दूसरे विभाग में चक्कर काटती रहती हैं। पड़ोसी राज्य की सफल नीतियों का अध्ययन करने के बावजूद अधिकारी उसी मॉडल को पूरी तरह से पहाड़ी भूगोल के अनुकूल ढालने में असफल साबित हो रहे हैं, जिसका खामियाजा सीधे तौर पर राज्य के उभरते हुए खिलाड़ियों को भुगतना पड़ रहा है।
भविष्य की संभावनाओं को लेकर खेल जगत और आम नागरिकों में अब नाराजगी बढ़ती जा रही है। यदि सरकार ने जल्द ही इस अटकी हुई नीति को गति नहीं दी, तो राज्य के कई बेहतरीन खिलाड़ी बेहतर भविष्य की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख करने के लिए मजबूर हो जाएंगे। खेल प्रेमियों ने मांग की है कि प्रशासन को सभी राजनीतिक और प्रशासनिक बाधाओं को दरकिनार करते हुए जल्द से जल्द नई खेल नीति को अमलीजामा पहनाना चाहिए, ताकि पहाड़ के हुनर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने का पूरा अवसर मिल सके।