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मध्य प्रदेश में खेल संस्कृति को नई दिशा: बाल अवस्था से ही खिलाड़ियों को मिलेंगी वैश्विक स्तर की सुविधाएं
राष्ट्रीय खेल दिवस के मौके पर मध्य प्रदेश सरकार ने खेलकूद को लेकर एक बड़ा और दूरदर्शी फैसला लिया है। अब राज्य में हरियाणा और महाराष्ट्र की तर्ज पर मात्र आठ साल की उम्र से ही प्रतिभाशाली बच्चों को तराशने की योजना बनाई जा रही है ताकि भविष्य के लिए तैयार किए जा सकें बेहतरीन खिलाड़ी।
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Ankit Yadav
30 अग 2026, 16:26
देश भर में राष्ट्रीय खेल दिवस के अवसर पर खेल जगत से जुड़ी कई नई और महत्वपूर्ण घोषणाएं सामने आ रही हैं। इसी कड़ी में मध्य प्रदेश सरकार ने भी अपने यहां खेल के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और बाल अवस्था से ही एथलीटों को प्रशिक्षित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। अब तक देश के कुछ चुनिंदा राज्य ही कम उम्र से बच्चों में खेल प्रतिभा की पहचान कर उन्हें पेशेवर स्तर पर कोचिंग देने के लिए जाने जाते थे, जिनमें हरियाणा और महाराष्ट्र का नाम सबसे ऊपर आता है। इन राज्यों के मॉडल ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई पदक विजेता दिए हैं। इसी सफलता को ध्यान में रखते हुए, अब मध्य प्रदेश में भी उसी तर्ज पर काम करने का फैसला लिया गया है, जिससे आने वाले समय में राज्य के बच्चों को वैश्विक स्तर की प्रतियोगिताओं के लिए बहुत पहले से तैयार किया जा सके।
कम उम्र में प्रतिभा की पहचान और वैज्ञानिक प्रशिक्षण
इस नई नीति के तहत जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं को खोजने के लिए विशेष अभियान चलाए जाएंगे। स्कूल और स्थानीय खेल अकादमियों के माध्यम से आठ साल के बच्चों की शारीरिक क्षमता, उनकी रुचि और खेल के प्रति रुझान का आंकलन किया जाएगा। एक बार जब सही प्रतिभा की पहचान हो जाएगी, तो उन्हें आधुनिक वैज्ञानिक प्रशिक्षण, पोषण विशेषज्ञों की देखरेख और उच्च स्तर की खेल सुविधाओं से लैस किया जाएगा। जानकारों का मानना है कि किसी भी खिलाड़ी को ओलंपिक या अन्य अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं के लिए तैयार करने में कम से कम आठ से दस साल की कड़ी मेहनत की जरूरत होती है। ऐसे में यदि आठ साल की उम्र से ही बच्चों को पेशेवर माहौल मिलना शुरू हो जाए, तो वे किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाएंगे।
देश के कई बड़े राज्यों ने खेल को केवल एक गतिविधि न मानकर इसे एक करियर और राज्य की प्रतिष्ठा का विषय बनाया है। हरियाणा ने जिस प्रकार कुश्ती, मुक्तेबाजी और अन्य खेलों में अपनी अमिट छाप छोड़ी है और महाराष्ट्र ने विभिन्न खेलों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है, उससे यह साबित होता है कि कम उम्र की ट्रेनिंग कितनी कारगर साबित होती है। मध्य प्रदेश में भी पिछले कुछ वर्षों में खेल सुविधाओं में काफी सुधार हुआ है और कई आधुनिक अकादमियां स्थापित की गई हैं। अब इस नई उम्र-सीमा संबंधी पहल से इन अकादमियों का उपयोग और भी अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकेगा। खेल प्रेमियों और विशेषज्ञों ने सरकार के इस कदम की सराहना करते हुए इसे राज्य में खेल संस्कृति को एक नई दिशा देने वाला करार दिया है।
भविष्य की उम्मीदें और जमीनी स्तर पर चुनौतियां
हालांकि इस महत्वाकांक्षी योजना की सफलता पूरी तरह से इसके सही क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों तक पहुंचकर आठ साल के बच्चों की प्रतिभा को ढूंढना और उन्हें शहरी स्तर की सुविधाएं मुहैया कराना एक बड़ी चुनौती होगी। इसके अलावा, खेल शिक्षकों, कोचों और बुनियादी खेल उपकरणों की उपलब्धता को हर जिले में सुनिश्चित करना होगा। यदि सरकार इन सभी पहलुओं पर गंभीरता से काम करती है, तो आने वाले कुछ ही वर्षों में मध्य प्रदेश देश को कई नए खेल आइकॉन दे सकता है। राष्ट्रीय खेल दिवस पर लिया गया यह संकल्प राज्य के खेल इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है, बशर्ते इसे योजनाबद्ध तरीके से जमीन पर उतारा जाए।