आज नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में आयोजित भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान कूटनीतिक मोर्चे पर एक बड़ी सफलता हासिल हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री के बीच हुई विस्तृत द्विपक्षीय वार्ता के बाद दोनों देशों के शिष्टमंडलों ने कुल पांच महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापनों (MoUs) का आदान-प्रदान किया। इस ऐतिहासिक बैठक का मुख्य फोकस ग्लोबल सप्लाई चेन को अधिक लचीला बनाना, उच्च तकनीक विनिर्माण में चीनी निर्भरता को कम करना और दोनों मित्र देशों के बीच व्यापारिक साझेदारी को अगले दशक के लक्ष्यों के अनुरूप उन्नत करना था। अधिकारियों के अनुसार, इन समझौतों से आगामी पांच वर्षों में भारत में जापानी निवेश में कम से कम 10 अरब डॉलर की वृद्धि होने की उम्मीद है।
सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम और हरित हाइड्रोजन पर विशेष जोर समझौतों के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से के तहत, भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा जापान के अर्थव्यवस्था, व्यापार और उद्योग मंत्रालय ने मिलकर 'इंडिया-जापान सेमीकंडक्टर पार्टनरशिप' की औपचारिक शुरुआत की है। इसके तहत गुजरात और कर्नाटक में अत्याधुनिक चिप डिजाइनिंग और फैब्रिकेशन यूनिट स्थापित करने के लिए जापानी कंपनियां भारतीय फर्मों को तकनीकी विशेषज्ञता और वित्तीय सहायता प्रदान करेंगी। इसके अलावा, कार्बन उत्सर्जन को कम करने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाते हुए दोनों देशों ने 'ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर' के विस्तार का भी ऐलान किया है, जिसके माध्यम से हाइड्रोजन ईंधन के उत्पादन और उसके वाणिज्यिक उपयोग के लिए एक साझा अनुसंधान केंद्र की स्थापना की जाएगी।
क्षेत्रीय सुरक्षा और रक्षा सहयोग पर सामरिक चर्चा आर्थिक समझौतों के अलावा, दोनों एशियाई दिग्गजों ने हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में शांति, स्थिरता और नौवहन की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए अपनी रणनीतिक साझेदारी को और प्रगाढ़ करने पर सहमति जताई। रक्षा मंत्रियों के बीच आगामी '2+2' मंत्रिस्तरीय वार्ता के एजेंडे को अंतिम रूप देते हुए समुद्री सुरक्षा, खुफिया जानकारी के आदान-प्रदान और संयुक्त सैन्य अभ्यासों के दायरे को बढ़ाने पर मुहर लगाई गई। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में यह समझौता दोनों देशों के साझा हितों की रक्षा करने और क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने में एक मील का पत्थर साबित होगा।