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रणनीतिक रक्षा सौदा: जेवलिन मिसाइल समझौते पर विशेषज्ञ वाइल अव्वाद की अमेरिका से तकनीक हस्तांतरण की मांग

रक्षा मामलों के विशेषज्ञ वाइल अव्वाद ने भारत और अमेरिका के बीच संभावित जेवलिन मिसाइल सौदे को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि यह सौदा देश की सैन्य ताकत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ ही अमेरिका को इसके साथ तकनीक हस्तांतरण (टेक्नोलॉजी ट्रांसफर) पर भी जोर देना चाहिए।

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Ankit Yadav
29 अग 2026, 11:39
रणनीतिक रक्षा सौदा: जेवलिन मिसाइल समझौते पर विशेषज्ञ वाइल अव्वाद की अमेरिका से तकनीक हस्तांतरण की मांग
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और आधुनिक हथियारों के अधिग्रहण को लेकर इन दिनों वैश्विक स्तर पर चर्चाएं तेज हैं। इसी बीच, भारत और अमेरिका के बीच संभावित जेवलिन मिसाइल समझौते को लेकर रक्षा विशेषज्ञ वाइल अव्वाद ने अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि आधुनिक रक्षा साजो-सामान के लिहाज से यह समझौता भारतीय सेना के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है, लेकिन इसके पूर्ण लाभ के लिए जरूरी है कि तकनीकी पहलू पर भी विशेष ध्यान दिया जाए।

तकनीक हस्तांतरण की अनिवार्यता

विशेषज्ञ का मानना है कि केवल हथियारों की खरीद से देश की दीर्घकालिक रक्षा क्षमताएं उस स्तर पर मजबूत नहीं होती हैं जैसी अपेक्षा की जाती है। भारत सरकार लगातार 'मेक इन इंडिया' और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दे रही है। ऐसे में किसी भी बड़े विदेशी रक्षा सौदे के तहत यदि तकनीक का ट्रांसफर (Technology Transfer) भी शामिल किया जाता है, तो इससे देश के भीतर ही अनुसंधान और विनिर्माण सेक्टर को जबरदस्त बढ़ावा मिलता है। वाइल अव्वाद ने जोर देकर कहा कि वाशिंगटन को नई दिल्ली के साथ इस साझेदारी में तकनीक साझा करने पर भी विचार करना चाहिए। वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए भारत और अमेरिका के बीच रक्षा संबंध पिछले कुछ वर्षों में काफी प्रगाढ़ हुए हैं। दोनों देश आपसी सहयोग को लगातार नई ऊंचाइयां दे रहे हैं ताकि क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता को सुनिश्चित किया जा सके। जेवलिन जैसी एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें आधुनिक युद्धक मैदान में पैदल सेना के लिए बेहद असरदार हथियार मानी जाती हैं। भारतीय थल सेना की मारक क्षमता को बढ़ाने के लिए इस तरह के हथियारों की हमेशा से मांग रही है, जो कठिन इलाकों में भी दुश्मनों के बख्तरबंद वाहनों को नेस्तनाबूद कर सकें। हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि केवल आयात पर निर्भर रहने के बजाय घरेलू रक्षा उद्योगों को मजबूत करना ही भविष्य का एकमात्र विकल्प है। जब तक विदेशी कंपनियां अपनी तकनीक स्थानीय निर्माताओं के साथ साझा नहीं करती हैं, तब तक पूर्ण रक्षा आत्मनिर्भरता का लक्ष्य हासिल करना चुनौतीपूर्ण बना रहता है। आने वाले समय में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बैठकों और रक्षा वार्ताओं में इस मुद्दे के प्रमुखता से उठाए जाने की उम्मीद है। इस पूरे घटनाक्रम पर रणनीतिक मामलों के जानकारों की निगाहें टिकी हुई हैं। यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में रक्षा सौदों को लेकर दोनों देशों के कूटनीतिक अधिकारियों के बीच क्या सहमति बनती है। क्या अमेरिका भारत की इस पुरानी और जायज मांग को स्वीकार करते हुए भविष्य के करारों में तकनीक साझा करने पर राजी होता है, यह आने वाला वक्त ही तय करेगा।
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