कारोबारी सत्र के दौरान सेंसेक्स और निफ्टी में बड़ी गिरावट
कारोबारी सत्र के अंत में बंबई स्टॉक एक्सचेंज का प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स 570.59 अंक या 0.79 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 71,909.70 के स्तर पर बंद हुआ। इसके साथ ही नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 50 सूचकांक 198.50 अंक यानी 0.88 प्रतिशत टूटकर 22,421.95 के स्तर पर आ गया। पूरे दिन के कारोबार के दौरान बाजार के इन प्रमुख पैमानों में जबरदस्त उतार-चढ़ाव दर्ज किया गया। सेंसेक्स कारोबार के बीच में 1,280 अंकों के भारी दायरे में गोता लगाता हुआ देखा गया। यह सूचकांक 72,573 के ऊंचे स्तर से फिसलकर सीधे 71,293 के निचले पायदान तक जा पहुंचा था। इसी तरह एनएसई निफ्टी 50 में भी कारोबार के दौरान 1.7 प्रतिशत यानी 394 अंकों की भारी गिरावट आई और यह 22,217 के न्यूनतम स्तर तक लुढ़क गया, जबकि इस दिन का उच्चतम स्तर 22,611 दर्ज किया गया था।
सूचकांकों के पिछले स्तर और सेक्टरवार शेयरों का हाल
सेंसेक्स की इस बड़ी गिरावट ने पिछले सभी निचले रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया। यह सूचकांक 2 अप्रैल, 2026 को बने अपने पिछले न्यूनतम स्तर 71,545 से भी नीचे फिसल गया। इसके अलावा निफ्टी ने भी इस साल अप्रैल के महीने में कैलेंडर वर्ष का निचला स्तर 22,183 छुआ था, जिसके करीब यह इस बार फिर पहुंच गया। विभिन्न सेक्टरों की बात करें तो बाजार की इस बिकवाली का सबसे ज्यादा असर कुछ चुनिंदा क्षेत्रों पर देखने को मिला। निफ्टी ऑटो, निफ्टी मेटल, निफ्टी मीडिया और निफ्टी एफएमसीजी सेक्टर के सूचकांकों में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई। इसके विपरीत, इन कठिन हालातों के बीच केवल निफ्टी आईटी एकमात्र ऐसा सेक्टर रहा जिसमें सबसे अधिक बढ़ोतरी देखने को मिली। विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की क्षेत्रीय भिन्नता ने निवेशकों के बीच कारोबार की दिशा को लेकर मिलीजुली स्थिति पैदा कर दी थी, जिससे पूरे सत्र के दौरान बाजार में दबाव साफ तौर पर महसूस किया गया।
बाजार में बिकवाली के कारण और विशेषज्ञों की सलाह
बाजार के जानकारों के अनुसार इस व्यापक बिकवाली के पीछे मुख्य रूप से बाहरी कारण जिम्मेदार रहे हैं। जियोजित इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के रिसर्च हेड विनोद नायर ने इस स्थिति पर बात करते हुए बताया कि घरेलू मोर्चे पर भी निवेशक आगामी वित्तीय परिणामों और रिजर्व बैंक की नीति को लेकर काफी सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। चालू तिमाही के वित्तीय नतीजे पिछली तिमाही के मुकाबले कमजोर रहने की आशंका जताई जा रही है क्योंकि पिछली बार ऑपरेटिंग कॉस्ट के मोर्चे पर जो फायदा मिला था, वह इस बार शायद वैसा देखने को न मिले। इसके साथ ही वैश्विक स्तर पर महंगाई का दबाव और भारतीय मुद्रा को समर्थन देने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक अपनी मौद्रिक नीति के रुख में बदलाव पर भी विचार कर सकता है। हालांकि इन तमाम चुनौतियों के बीच देश की अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है और किसी भी संकट का सामना करने के लिए पूरी तरह से तैयार है। लॉन्ग टर्म निवेशक बाजार की इस कमजोरी का फायदा उठाकर धीरे-धीरे और निवेश जारी रख सकते हैं, जबकि शॉर्ट टर्म निवेशकों के लिए जब तक वैश्विक स्तर पर स्थिरता नहीं आती, तब तक इंतजार करो और देखो की नीति अपनाना ही सबसे बेहतर विकल्प रहेगा।