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बाजार में उतार-चढ़ाव: डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ और फेडरल रिजर्व रेट हाइक के बीच भारतीय बाजार में दिखा दबाव
वैश्विक स्तर पर डोनाल्ड ट्रंप के नए टैरिफ नियमों और फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों में बदलाव के फैसलों का असर अब भारतीय शेयर बाजार पर भी साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। कई तरह के बाहरी दबावों के बावजूद घरेलू निवेशकों और मजबूत आर्थिक फंडामेंटल्स के दम पर बाजार ने अपनी स्थिति को काफी हद तक संभाले रखा है, जिससे निवेशकों को थोड़ी राहत मिली है।
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Ankit Yadav
18 सित 2026, 14:32
वैश्विक वित्तीय बाजारों में इस समय भारी हलचल मची हुई है। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए जाने वाले संभावित कड़े टैरिफ नियमों ने वैश्विक व्यापार को लेकर अनिश्चितता पैदा कर दी है, तो दूसरी तरफ अमेरिकी केंद्रीय बैंक यानी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी के फैसलों ने निवेशकों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इन दोनों बड़े अंतरराष्ट्रीय कारकों का सीधा असर उभरते हुए बाजारों विशेषकर भारतीय शेयर बाजार पर दबाव के रूप में सामने आ रहा है। इसके बावजूद, घरेलू बाजार ने अपनी सहनशक्ति का परिचय देते हुए भारी गिरावट से खुद को बचाए रखा है।
घरेलू अर्थव्यवस्था की मजबूती और निवेशकों का रुख
विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही वैश्विक स्तर पर नकारात्मक खबरें निवेशकों के मनोबल को प्रभावित कर रही हों, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था की आंतरिक मजबूती और कॉरपोरेट जगत के बेहतर प्रदर्शन ने बाजार को गिरने से थाम रखा है। स्थानीय स्तर पर खुदरा निवेशकों की बढ़ती भागीदारी और म्यूचुअल फंड्स में लगातार आ रहे निवेश ने बाजार को एक बड़ा संबल प्रदान किया है। जब भी विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) बिकवाली का दबाव बनाते हैं, तब घरेलू संस्थागत निवेशक (DII) बाजार को संभालने में अहम भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि बाहरी झटकों के बावजूद सूचकांकों में भारी क्रैश देखने को नहीं मिला है।
आगे की चुनौतियां और बाजार की चाल
हालांकि बाजार ने हालिया दबाव को झेल लिया है, लेकिन आने वाले दिनों में सतर्क रहने की पूरी आवश्यकता है। अमेरिका और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में होने वाले नीतिगत बदलाव आने वाले हफ्तों में भी भारतीय बाजारों की दिशा तय करेंगे। वैश्विक मुद्रास्फीति, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक तनाव जैसे कारक भी निवेशकों की रडार पर बने हुए हैं। लखनऊ और देश के अन्य हिस्सों के वित्तीय विश्लेषकों का सुझाव है कि निवेशकों को इस माहौल में केवल मजबूत फंडामेंटल्स वाली कंपनियों के शेयरों पर ही दांव लगाना चाहिए और किसी भी तरह की पैनिक सेलिंग से बचना चाहिए।
भविष्य को लेकर बाजार के जानकारों का अनुमान है कि जब तक वैश्विक मोर्चे पर स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो जाती, तब तक बाजार में इसी तरह का सीमित उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। नीति निर्माताओं और केंद्रीय बैंकों के अगले कदमों पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं, ताकि यह अंदाजा लगाया जा सके कि आने वाले महीनों में वैश्विक व्यापार और ब्याज दरों का रुख किस दिशा में आगे बढ़ेगा।