खुले बाजार संचालन में मिली भारी सफलता भारतीय रिजर्व बैंक ने बाजार से अतिरिक्त तरलता को बाहर निकालने के अपने हालिया अभियान के तहत 25000 करोड़ रुपये की ओपन मार्केट ऑपरेशन यानी ओएमओ बिक्री की घोषणा की थी जिसके बाद वित्तीय संस्थानों और बैंकों की तरफ से बेहद उत्साहजनक प्रतिक्रिया सामने आई है। केंद्रीय बैंक की इस विशेष वित्तीय कवायद के दौरान निर्धारित लक्ष्य से लगभग तीन गुना अधिक बोलियां निवेशकों और बैंकों द्वारा लगाई गईं जिससे यह साबित होता है कि बाजार में निवेश योग्य पूंजी की कोई कमी नहीं है और संस्थागत खरीदार इस प्रकार के सरकारी प्रतिभूति लेन-देन में गहरी दिलचस्पी रखते हैं। रिजर्व बैंक इस प्रकार की सुनियोजित बिक्री के माध्यम से बैंकिंग प्रणाली के भीतर मौजूद अतिरिक्त धन को नियंत्रित करने और वित्तीय स्थिरता बनाए रखने का निरंतर प्रयास कर रहा है ताकि अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति के दबावों को समय रहते साधा जा सके। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान देश के बड़े बैंकों और वित्तीय संस्थाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अपनी बोलियों के जरिए यह स्पष्ट कर दिया कि सरकारी बॉन्ड और प्रतिभूतियों की मांग हमेशा की तरह बेहद मजबूत बनी हुई है।
वित्तीय प्रणाली में तरलता नियंत्रण की पृष्ठभूमि देश के केंद्रीय बैंक द्वारा इस तरह के खुले बाजार संचालन तब अमल में लाए जाते हैं जब वित्तीय तंत्र में नकदी का प्रवाह आवश्यकता से अधिक बढ़ जाता है और उससे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक तथा महंगाई दर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने का जोखिम पैदा होने लगता है। रिजर्व बैंक के पास ऐसे कई पारंपरिक और गैर-पारंपरिक उपकरण मौजूद होते हैं जिनके जरिए वह अर्थव्यवस्था में पैसे के बहाव को या तो तेज कर सकता है या फिर उसे वापस खींचकर संतुलित कर सकता है। जब केंद्रीय बैंक सरकारी प्रतिभूतियों को बाजार में बेचता है तो वह वाणिज्यिक बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के पास मौजूद अतिरिक्त फंड को अपने पास सुरक्षित कर लेता है जिससे कुल मिलाकर बाजार में मुद्रा की आपूर्ति में कमी आती है और ब्याज दरों पर नियंत्रण रखना आसान हो जाता है। इस प्रकार की मौद्रिक नीतियों का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि देश की आर्थिक वृद्धि दर और मूल्य स्थिरता के बीच एक स्वस्थ संतुलन बना रहे ताकि आम जनता को रोजमर्रा की वस्तुओं और सेवाओं के लिए अत्यधिक महंगाई का सामना न करना पड़े। देश के वित्तीय विश्लेषक और अर्थशास्त्री इस पूरी मौद्रिक गतिविधि पर बहुत करीब से नजर बनाए रखते हैं क्योंकि इससे आने वाले दिनों में बैंक ऋण की ब्याज दरों और कुल मिलाकर देश की वित्तीय दिशा का स्पष्ट अनुमान लगाया जा सकता है।
बाजार पर प्रभाव और आगामी मौद्रिक नीतियां इस बड़ी बिक्री को मिली अपार सफलता के बाद अब यह माना जा रहा है कि रिजर्व बैंक आने वाले हफ्तों में भी अपनी मौद्रिक नीतियों को लेकर इसी तरह के सख्त और सतर्क रुख को बनाए रख सकता है ताकि अर्थव्यवस्था में किसी भी तरह का वित्तीय असंतुलन न पनप सके। जब केंद्रीय बैंक बाजार से इस पैमाने पर पूंजी को सोख लेता है तो बैंकों के पास आगे उधार देने के लिए उपलब्ध धन की मात्रा में मामूली कमी आ सकती है जिसका असर अंततः खुदरा और व्यावसायिक ऋणों की ब्याज दरों पर भी देखने को मिल सकता है। हालांकि बाजार के जानकारों का यह भी मानना है कि इस तरह की समय पर की गई कार्रवाई से लंबी अवधि में वित्तीय प्रणाली अधिक पारदर्शी, मजबूत और सुरक्षित बनती है जो किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए बेहद आवश्यक होती है। आने वाले समय में रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की होने वाली बैठकों में भी इस बात की गहन समीक्षा की जाएगी कि इस ओएमओ बिक्री का मुद्रास्फीति और बैंक साख पर किस प्रकार का दीर्घकालिक असर पड़ा है। देश के तमाम बड़े निवेशक और वित्तीय संस्थान अब इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि केंद्रीय बैंक अपनी अगली द्विमासिक मौद्रिक समीक्षा में ब्याज दरों और तरलता प्रबंधन को लेकर क्या नए और दूरदर्शी दिशा-निर्देश जारी करता है।