धान के समर्थन मूल्य में मामूली वृद्धि पर असंतोष कृषि क्षेत्र से जुड़े मामलों और किसानों की आजीविका पर गहरी नजर रखने वाले विशेषज्ञ डॉ. उपाध्याय ने धान के समर्थन मूल्य में हाल ही में की गई 72 रुपये की बढ़ोतरी को पूरी तरह से नाकाफी और निराशाजनक करार दिया है। उनका यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब देश भर में खेती की बढ़ती लागत, खाद, बीज, कीटनाशक और डीजल के दामों में बेतहाशा तेजी आ चुकी है। इस प्रकार की मामूली बढ़ोतरी से अन्नदाताओं को उनकी लागत का उचित मूल्य मिलना तो दूर, बल्कि उनकी आर्थिक बदहाली और अधिक गहरी होती चली जाएगी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस प्रकार के मामूली आंकड़ों का कोई व्यावहारिक महत्व नहीं रह जाता है जब बाजार में हर जरूरी वस्तु की कीमतें आसमान छू रही हों। किसानों को उम्मीद थी कि सरकार इस बार उनकी वास्तविक लागत और श्रम को ध्यान में रखते हुए एक ठोस और सम्मानजनक मूल्य वृद्धि की घोषणा करेगी, परंतु 72 रुपये जैसी मामूली राशि ने उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।
खेती की बढ़ती लागत और किसानों की आर्थिक चुनौतियां भारत में धान की खेती करना अब किसानों के लिए लगातार घाटे का सौदा बनता जा रहा है क्योंकि हर सीजन में जुताई, रोपाई, कटाई और सिंचाई के खर्च में भारी उछाल दर्ज किया जाता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि प्रणाली की संरचना को समझने वाले विश्लेषक मानते हैं कि जब तक न्यूनतम समर्थन मूल्य की गणना वैज्ञानिक तरीकों और जमीनी वास्तविकताओं के आधार पर नहीं की जाएगी, तब तक किसानों की स्थिति में सुधार होना असंभव है। वर्तमान समय में कृषि उपकरणों के दाम, मजदूरों की मजदूरी और परिवहन खर्च में कई गुना वृद्धि हो चुकी है, जिसके मुकाबले समर्थन मूल्य में महज कुछ रुपयों की बढ़ोतरी एक प्रकार का मजाक बनकर रह जाती है। राज्य और केंद्र स्तर की नीतियां अक्सर कागजों पर तो किसानों के कल्याण का दावा करती हैं, परंतु धरातल पर अन्नदाता अपनी उपज का उचित मूल्य पाने के लिए दर-दर भटकने को मजबूर होते हैं। इस तरह के हालात न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी को बढ़ावा देते हैं बल्कि युवा पीढ़ी का कृषि के प्रति मोह भी पूरी तरह से भंग कर रहे हैं, जिससे देश की दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
नीतिगत बदलाव और भविष्य की संभावित प्रतिक्रियाएं डॉ. उपाध्याय द्वारा उठाए गए इस गंभीर मुद्दे के बाद कृषि हलकों में एक नई बहस छिड़ गई है और आने वाले दिनों में किसान संगठनों द्वारा सरकार पर दबाव बनाए जाने की पूरी संभावना है। यदि समय रहते नीति निर्माताओं ने न्यूनतम समर्थन मूल्य और कृषि लागत के इस बड़े अंतर को पाटने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो देश के विभिन्न हिस्सों में व्यापक विरोध प्रदर्शन देखने को मिल सकते हैं। सरकार को यह समझना होगा कि केवल सांकेतिक घोषणाओं से कृषि संकट का समाधान नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए एक दीर्घकालिक, व्यावहारिक और किसान-हितैषी आर्थिक ढांचे की सख्त आवश्यकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक बाजार में पारदर्शिता लाकर किसानों को बिचौलियों के चंगुल से मुक्त नहीं कराया जाता और उनकी उपज का सही मूल्यांकन सुनिश्चित नहीं होता, तब तक अन्नदाताओं का यह दर्द यूं ही बना रहेगा। इस प्रकार की तीखी प्रतिक्रियाएं प्रशासन को अपनी नीतियों की समीक्षा करने और भविष्य के बजट तथा समर्थन मूल्य निर्धारण में अधिक संवेदनशीलता दिखाने के लिए विवश कर सकती हैं।