कंटाप
NEWS
शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2026
Follow Us
ब्रेकिंग
PM बोले-कुछ लोग विदेशों में भारत को बदनाम कर रहे: कांग्रेस कब तक अपने फेल प्रोडक्ट की लॉन्चिंग के लिए देश क...      अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का जामनगर जाना क्या भारत की अहमियत बताता है?      फ़्रांस के राष्ट्रपति विदेशी नेताओं पर भड़के, 'इस्लामी और प्रवासी भीड़' के आरोप पर दिया जवाब      सऊदी अरब में दो बांग्लादेशियों को मौत की सज़ा दिए जाने से जुड़े वे सवाल जो हैं अनसुलझे      मुझे गालियां पड़ेंगी, लेकिन...; योगेंद्र यादव ने कहा- अभी मोदी का इस्तीफा नहीं चाहते लोग      असम सरकार का बड़ा फैसला, रिटायरमेंट से 1 साल पहले शुरू होगी पेंशन की प्रक्रिया      Tiger Shroff Attack Case में बड़ा खुलासा, वारदात से पहले शूटरों ने की थी बंदूक चलाने की प्रैक्टिस, हुआ था म      दिल्‍ली नगर निगम में विकास निधि-प्रदूषण पर AAP का हंगामा, पार्षदों में हाथापाई की नौबत; मेयर को सुरक्षित निकाला     
SENSEX लोड हो रहा... | NIFTY लोड हो रहा... | GOLD (10g) ₹— | SILVER (10g) ₹— | USD/INR ₹— | CRUDE OIL $— | Uttar Pradesh — लोड हो रहा है | --:--:-- | लाइव अपडेट
@NewsKantap:
व्यापार

नाकाफी वृद्धि: धान के समर्थन मूल्य में 72 रुपये की बढ़ोतरी पर डॉ. उपाध्याय की कड़ी प्रतिक्रिया

धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य में की गई 72 रुपये की हालिया बढ़ोतरी को कृषि विशेषज्ञों ने किसानों के साथ छलावा करार दिया है। डॉ. उपाध्याय ने इस मामूली इजाफे को अपर्याप्त बताते हुए सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

A
Ankit Yadav
27 सित 2026, 16:38
नाकाफी वृद्धि: धान के समर्थन मूल्य में 72 रुपये की बढ़ोतरी पर डॉ. उपाध्याय की कड़ी प्रतिक्रिया

धान के समर्थन मूल्य में मामूली वृद्धि पर असंतोष कृषि क्षेत्र से जुड़े मामलों और किसानों की आजीविका पर गहरी नजर रखने वाले विशेषज्ञ डॉ. उपाध्याय ने धान के समर्थन मूल्य में हाल ही में की गई 72 रुपये की बढ़ोतरी को पूरी तरह से नाकाफी और निराशाजनक करार दिया है। उनका यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब देश भर में खेती की बढ़ती लागत, खाद, बीज, कीटनाशक और डीजल के दामों में बेतहाशा तेजी आ चुकी है। इस प्रकार की मामूली बढ़ोतरी से अन्नदाताओं को उनकी लागत का उचित मूल्य मिलना तो दूर, बल्कि उनकी आर्थिक बदहाली और अधिक गहरी होती चली जाएगी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस प्रकार के मामूली आंकड़ों का कोई व्यावहारिक महत्व नहीं रह जाता है जब बाजार में हर जरूरी वस्तु की कीमतें आसमान छू रही हों। किसानों को उम्मीद थी कि सरकार इस बार उनकी वास्तविक लागत और श्रम को ध्यान में रखते हुए एक ठोस और सम्मानजनक मूल्य वृद्धि की घोषणा करेगी, परंतु 72 रुपये जैसी मामूली राशि ने उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।

खेती की बढ़ती लागत और किसानों की आर्थिक चुनौतियां भारत में धान की खेती करना अब किसानों के लिए लगातार घाटे का सौदा बनता जा रहा है क्योंकि हर सीजन में जुताई, रोपाई, कटाई और सिंचाई के खर्च में भारी उछाल दर्ज किया जाता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि प्रणाली की संरचना को समझने वाले विश्लेषक मानते हैं कि जब तक न्यूनतम समर्थन मूल्य की गणना वैज्ञानिक तरीकों और जमीनी वास्तविकताओं के आधार पर नहीं की जाएगी, तब तक किसानों की स्थिति में सुधार होना असंभव है। वर्तमान समय में कृषि उपकरणों के दाम, मजदूरों की मजदूरी और परिवहन खर्च में कई गुना वृद्धि हो चुकी है, जिसके मुकाबले समर्थन मूल्य में महज कुछ रुपयों की बढ़ोतरी एक प्रकार का मजाक बनकर रह जाती है। राज्य और केंद्र स्तर की नीतियां अक्सर कागजों पर तो किसानों के कल्याण का दावा करती हैं, परंतु धरातल पर अन्नदाता अपनी उपज का उचित मूल्य पाने के लिए दर-दर भटकने को मजबूर होते हैं। इस तरह के हालात न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी को बढ़ावा देते हैं बल्कि युवा पीढ़ी का कृषि के प्रति मोह भी पूरी तरह से भंग कर रहे हैं, जिससे देश की दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

नीतिगत बदलाव और भविष्य की संभावित प्रतिक्रियाएं डॉ. उपाध्याय द्वारा उठाए गए इस गंभीर मुद्दे के बाद कृषि हलकों में एक नई बहस छिड़ गई है और आने वाले दिनों में किसान संगठनों द्वारा सरकार पर दबाव बनाए जाने की पूरी संभावना है। यदि समय रहते नीति निर्माताओं ने न्यूनतम समर्थन मूल्य और कृषि लागत के इस बड़े अंतर को पाटने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो देश के विभिन्न हिस्सों में व्यापक विरोध प्रदर्शन देखने को मिल सकते हैं। सरकार को यह समझना होगा कि केवल सांकेतिक घोषणाओं से कृषि संकट का समाधान नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए एक दीर्घकालिक, व्यावहारिक और किसान-हितैषी आर्थिक ढांचे की सख्त आवश्यकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक बाजार में पारदर्शिता लाकर किसानों को बिचौलियों के चंगुल से मुक्त नहीं कराया जाता और उनकी उपज का सही मूल्यांकन सुनिश्चित नहीं होता, तब तक अन्नदाताओं का यह दर्द यूं ही बना रहेगा। इस प्रकार की तीखी प्रतिक्रियाएं प्रशासन को अपनी नीतियों की समीक्षा करने और भविष्य के बजट तथा समर्थन मूल्य निर्धारण में अधिक संवेदनशीलता दिखाने के लिए विवश कर सकती हैं।

कंटाप
NEWS
होम 🇮🇳 देश 🗺️ राज्य 🌍 विदेश 🏛️ राजनीति 💼 व्यापार 🏏 खेल 🎬 मनोरंजन 💻 टेक्नोलॉजी 🏥 स्वास्थ्य 📚 शिक्षा 🕉️ धर्म वीडियो राशिफल खोज