पारंपरिक कला का भव्य आयोजन
देश के विभिन्न प्रांतों की प्राचीन हस्तकला और हाथ से बनी हुई वस्तुओं का एक सुंदर संगम इस समय शहर के पुराने बस अड्डा परिसर में देखने को मिल रहा है। इस विशेष आयोजन के तहत गांधी शिल्प बाजार का औपचारिक रूप से उद्घाटन मंगलवार की शाम को संपन्न हुआ। जिला प्रशासन के प्रमुख अधिकारी और उपायुक्त जतिन लाल ने इस बाजार का विधिवत शुभारंभ किया। उद्घाटन समारोह के तुरंत बाद प्रशासनिक प्रमुख ने इस परिसर में लगाए गए विभिन्न स्टॉलों का गहराई से निरीक्षण किया। उन्होंने वहां मौजूद दस्तकारों और कारीगरों से आमने-सामने बातचीत की तथा उनके द्वारा लाई गई वस्तुओं और उन्हें तैयार करने की पुरानी पद्धतियों की पूरी जानकारी प्राप्त की। इस दौरान उन्होंने कुशल कारीगरों के अद्भुत हुनर की खुले मन से प्रशंसा भी की। कारीगरों का उत्साह बढ़ाने के लिए उन्होंने हस्तशिल्प से जुड़ी कुछ चुनिंदा वस्तुओं की अपनी तरफ से खरीदारी भी की। यह बाजार आने वाले दिनों में स्थानीय लोगों के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र रहेगा क्योंकि यहां देश के कोने-कोने से आई हुई अनूठी और पारंपरिक वस्तुएं एक ही छत के नीचे देखने को मिल रही हैं। आयोजन स्थल पर सुबह से लेकर शाम तक खरीदारों की चहल-पहल बनी हुई है और लोग बढ़-चढ़कर इस कला प्रदर्शनी का आनंद ले रहे हैं।
विभिन्न राज्यों के कारीगरों की भागीदारी
इस राष्ट्रीय स्तर के शिल्प बाजार में देश के अनेक हिस्सों से आए हुए हुनरमंद लोग अपनी अद्भुत कलाकृतियों के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक शहर बनारस के दस्तकार, जम्मू-कश्मीर के उधमपुर और बसोहली क्षेत्रों के पारंपरिक शिल्पी इस मेले का हिस्सा बने हैं। इसके अतिरिक्त पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक विरासत को दर्शाने वाले उत्पाद, मध्य प्रदेश की कला और छत्तीसगढ़ के पारंपरिक सामान भी यहां लाए गए हैं। बिहार के लोक शिल्प, राजस्थान की प्रसिद्ध कलात्मक वस्तुएं, झारखंड के दस्तकारों के उत्पाद तथा देश की राजधानी दिल्ली से आए कारीगर भी अपने सामान के साथ स्टॉल सजाए हुए हैं। केवल दूसरे राज्यों से ही नहीं, बल्कि अपने ही प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए हुए दस्तकार भी अपनी स्थानीय विशिष्टता का प्रदर्शन कर रहे हैं। पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों जैसे कि कुल्लू, शिमला, चंबा, मंडी, किन्नौर, लाहौल-स्पीति के साथ-साथ स्थानीय क्षेत्रों ऊना, बंगाणा और गगरेट के पारंपरिक हस्तशिल्प भी इस परिसर की रौनक को कई गुना बढ़ा रहे हैं। अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों की अनूठी और विशिष्ट कारीगरी के कारण यह पूरा बाजार एक विशाल सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक बन गया है। आगंतुक इन सभी जगहों की संस्कृति और पारंपरिक निर्माण शैलियों को बहुत करीब से महसूस कर पा रहे हैं और कारीगरों के इस प्राचीन कौशल को देखकर पूरी तरह अचंभित भी हो रहे हैं।
बाजार का उद्देश्य और समय सीमा
कारीगरों को अपनी कला के प्रदर्शन और उसके व्यावसायिक विस्तार के लिए एक सुदृढ़ मंच उपलब्ध कराना इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य है। इस अनूठे बाजार के माध्यम से दूर-दराज के क्षेत्रों से आए दस्तकारों को अपनी छिपी हुई प्रतिभा और हस्तनिर्मित उत्पादों को एक बहुत बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचाने का खुला अवसर मिलता है। इसके दूसरी तरफ, स्थानीय निवासियों और आम खरीददारों के लिए यह एक सुनहरा मौका है कि वे देश के दूरदराज इलाकों की पारंपरिक कलाओं और हाथ से बनी हुई अनमोल वस्तुओं को बहुत करीब से देख सकें और अपनी पसंद की चीजें खरीद सकें। यह पूरा शिल्प बाजार अपनी तय समय-सीमा के अनुसार आने वाली 18 अक्तूबर तक लगातार संचालित होता रहेगा। इस निर्धारित अवधि के दौरान कोई भी नागरिक पुराने बस अड्डा परिसर में आकर इन वस्तुओं की प्रदर्शनी का दीदार कर सकता है और खरीदारी कर सकता है। प्रशासन और आयोजकों द्वारा इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि आने वाले सभी आगंतुकों को किसी भी प्रकार की असुविधा न हो और कारीगर अपने उत्पादों को सुरक्षित माहौल में प्रदर्शित कर सकें। इस प्रकार के आयोजनों से स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी एक नई गति मिलती है और हमारी पुरानी सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने तथा उसे आगे बढ़ाने में बहुत बड़ी मदद मिलती है।