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वैश्विक बाजार में गिरावट: ब्रिटेन की बॉन्ड यील्ड 1998 के बाद रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंची

शुक्रवार को एशियाई शेयर बाजारों में भारी दबाव दर्ज किया गया। निवेशक अमेरिकी रोजगार आंकड़ों का इंतजार कर रहे हैं और बॉन्ड बाजार की हलचल ने चिंता बढ़ा दी है।

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Ankit Yadav
02 अक्ट 2026, 11:49
वैश्विक बाजार में गिरावट: ब्रिटेन की बॉन्ड यील्ड 1998 के बाद रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंची

एशियाई शेयर बाजारों में कमजोरी

शुक्रवार के कारोबारी सत्र के दौरान एशियाई शेयर बाजारों में मंदी का रुख देखा गया। जापान को छोड़कर एमएससीआई का एशिया-प्रशांत इक्विटी इंडेक्स लगभग शून्य दशमलव पाँच प्रतिशत नीचे आ गया। यह सूचकांक इस पूरे सप्ताह के दौरान करीब एक दशमलव सात प्रतिशत की गिरावट की ओर आगे बढ़ रहा था। इसके अलावा जापान का निक्केई सूचकांक भी लगभग शून्य दशमलव सात प्रतिशत लुढ़क गया। हालांकि पूरे सप्ताह के लिहाज से जापानी बाजार में करीब तीन दशमलव एक प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई थी। चीन के मुख्य शेयर बाजार सार्वजनिक अवकाश के चलते अगले सप्ताह के बुधवार तक पूरी तरह से बंद चल रहे हैं। दूसरी तरफ अमेरिकी शेयर बाजार के वायदा कारोबार में हल्की सी तेजी नजर आ रही थी। नैस्डैक फ्यूचर लगभग शून्य दशमलव तीन प्रतिशत और एसएंडपी पाँच सौ फ्यूचर लगभग शून्य दशमलव एक प्रतिशत की बढ़त के साथ कारोबार कर रहे थे। निवेशकों का मुख्य ध्यान अब शुक्रवार को आने वाले अमेरिकी पेरोल्स रिपोर्ट पर टिका हुआ है। सितंबर के महीने में करीब नब्बे हजार नई नौकरियों के सृजन की उम्मीद जताई जा रही है। साथ ही अमेरिकी बेरोजगारी दर चार दशमलव एक प्रतिशत के स्तर पर स्थिर बनी रहने का अनुमान लगाया जा रहा है। फ्रांस की राजकोषीय स्थिति को लेकर चिंताएं बढ़ने से फ्रांस और जर्मनी की दस-वर्षीय बॉन्ड यील्ड के बीच का अंतर एक सौ चालीस बेसिस प्वाइंट से ऊपर निकल गया। यह अंतर वर्ष 2012 के बाद से अब तक का सबसे बड़ा अंतर बन गया है और इसका बुरा असर यूरो की मुद्रा पर भी साफ दिखाई दिया है। यूरो का मूल्य गिरकर डॉलर के मुकाबले लगभग एक दशमलव एक दो एक पाँच डॉलर तक पहुंच गया। यह स्तर मई 2025 के बाद से यूरो का सबसे निचला स्तर दर्ज किया गया है।

ब्रिटेन और अमेरिका में बॉन्ड यील्ड में तेजी

ब्रिटेन के बॉन्ड बाजार में गुरुवार के दिन अभूतपूर्व हलचल देखने को मिली। ब्रिटेन का तीस-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड बढ़कर रिकॉर्ड छह दशमलव शून्य दो नौ प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गया। यह ऐतिहासिक स्तर जनवरी 1998 के बाद से सबसे ऊंचा स्तर साबित हुआ है। इसके साथ ही ब्रिटेन की दस-वर्षीय गिल्ट यील्ड भी बढ़कर पाँच दशमलव पाँच एक शून्य प्रतिशत हो गई। यह जुलाई 2007 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। ब्रिटेन में लगातार बढ़ रही ऊर्जा और खाद्य पदार्थों की कीमतों के कारण महंगाई को लेकर चिंताएं गहरी हो रही हैं। इन घरेलू हालातों की वजह से ब्याज दरों में और बढ़ोतरी होने की आशंका बाजार में बढ़ती जा रही है। दूसरी ओर संयुक्त राज्य अमेरिका में भी बॉन्ड बाजार का यही हाल रहा। अमेरिकी दस-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड कारोबार के दौरान बढ़कर पाँच दशमलव तीन चार प्रतिशत तक जा पहुंची। यह वर्ष 2002 के बाद का सबसे उच्चतम स्तर था। हालांकि बाद में इसमें थोड़ी नरमी आई और एशियाई कारोबार के समय यह लगभग पाँच दशमलव दो पाँच प्रतिशत के आसपास बनी रही। बॉन्ड यील्ड में लगातार हो रही यह तेज बढ़ोतरी शेयर बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। ऊंची यील्ड होने के कारण शेयर बाजार पर दबाव लगातार बढ़ता जाता है और साथ ही अमेरिकी डॉलर की मांग भी इससे प्रभावित होती है। अमेरिकी डॉलर इंडेक्स एक सौ दो दशमलव शून्य नौ के आसपास स्थिर रहा और यह लगातार तीसरे हफ्ते बढ़त दर्ज करने की राह पर आगे बढ़ रहा है। जापानी येन पर भी लगातार भारी दबाव बना हुआ है और डॉलर के मुकाबले येन करीब एक सौ अट्ठावन दशमलव एक तीन के स्तर पर कारोबार कर रहा था।

महंगाई और मध्य-पूर्व का तनाव

जापान की राजधानी टोक्यो में सितंबर के महीने में महंगाई दर बढ़कर दो दशमलव सात प्रतिशत तक पहुंच गई। इस आंकड़े के सामने आने के बाद बैंक ऑफ जापान द्वारा आगे चलकर ब्याज दरों में बढ़ोतरी करने की संभावनाओं पर चर्चाएं तेज हो गई हैं। दूसरी तरफ मध्य-पूर्व क्षेत्र में जारी सैन्य तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड ऑयल की कीमत करीब बानवे दशमलव आठ चार डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई है। इससे ठीक एक दिन पहले कच्चे तेल की कीमतों में लगभग तीन प्रतिशत की भारी तेजी दर्ज की गई थी। इसके अलावा ब्रेंट क्रूड ऑयल का भाव भी एक सौ दो डॉलर प्रति बैरल से ऊपर ही बना हुआ है। ऊर्जा के इन ऊंचे दामों और जिंसों की बढ़ती कीमतों ने वैश्विक स्तर पर निवेशकों की नींद उड़ा रखी है। विश्लेषकों का मानना है कि बॉन्ड और करेंसी बाजारों में हो रहे इन तेज उतार-चढ़ाव से अर्थव्यवस्था की चाल प्रभावित हो रही है। अमेरिकी रोजगार के नए आंकड़े और मध्य-पूर्व की भू-राजनीतिक स्थितियां आने वाले दिनों में बाजार की दिशा तय करेंगी। निवेशकों को हर एक वैश्विक आर्थिक संकेत पर कड़ी नजर रखनी पड़ रही है ताकि वे अपने पोर्टफोलियो को सुरक्षित रख सकें। बढ़ती ब्याज दरों और महंगाई के इस दौर में केंद्रीय बैंकों के आगामी फैसले बहुत अहम साबित होने वाले हैं। वैश्विक वित्तीय बाजारों में इस समय अनिश्चितता का माहौल छाया हुआ है और सभी बड़े सूचकांक इन तमाम घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच दिशा तलाशने की कोशिश में जुटे हुए हैं।

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