घंटाघर से निकली भव्य शोभायात्रा और जलधारा की ओर प्रस्थान बाराबंकी नगर के प्रमुख स्थलों में शामिल घंटाघर के पास से गणेश प्रतिमा के विसर्जन के लिए एक विशाल और भव्य शोभायात्रा की शुरुआत हुई जिसमें भारी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन और गणपति बप्पा मोरया के गूंजते जयकारों के साथ यह काफिला आगे बढ़ा। मार्ग में जगह-जगह भक्तों ने पुष्प वर्षा कर प्रतिमा का स्वागत किया और अपनी अटूट आस्था का परिचय दिया। जुलूस के दौरान सुरक्षा और शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्थानीय प्रशासन के अधिकारी भी मुस्तैद नजर आए ताकि किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। अंततः यह यात्रा निर्धारित मार्ग से होते हुए कल्याणी नदी के तट पर पहुंची जहाँ अनुष्ठानिक विधि-विधान के साथ प्रतिमा को जल में प्रवाहित करने की प्रक्रिया पूरी की गई। इस दौरान उपस्थित सभी लोगों के चेहरों पर एक तरफ उत्सव का उल्लास था तो दूसरी तरफ अगले बरस आने का वादा करते हुए विदाई का भाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था।
सार्वजनिक आयोजनों की परंपरा और धार्मिक सांस्कृतिक महत्व भारतीय संस्कृति में गणेश चतुर्थी का यह महापर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है बल्कि यह समाज को एकजुट करने का एक बड़ा माध्यम भी माना जाता है। उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों की तरह बाराबंकी में भी पिछले कई दिनों से पंडालों में स्थापित भगवान गणेश की प्रतिमाओं की नियमित पूजा-अर्चना और आरती का दौर चल रहा था। इन आयोजनों के पीछे सामुदायिक सौहार्द को बढ़ावा देना और युवा पीढ़ी को अपनी समृद्ध परंपराओं से जोड़े रखना मुख्य उद्देश्य होता है। इस प्रकार के भव्य आयोजनों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर छोटे दुकानदारों और कारीगरों को भी अपनी आजीविका चलाने के लिए एक अच्छा अवसर मिल जाता है। नगर के तमाम प्रतिष्ठित और सामाजिक संगठनों के सहयोग से इन आयोजनों को सफलता पूर्वक संपन्न कराया जाता है जिसमें हर वर्ग के लोग बिना किसी भेदभाव के बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में साफ-सफाई और पर्यावरण का ध्यान रखना भी आयोजकों की प्राथमिकता में शामिल रहता है ताकि उत्सव के बाद भी जल स्रोतों की शुद्धता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े और पर्व का आनंद पूर्ण रूप से सुरक्षित बना रहे।
विसर्जन के बाद समापन और अगले साल के स्वागत की तैयारियां कल्याणी नदी के तट पर विसर्जन की औपचारिकताएं पूर्ण होने के बाद इस दस दिवसीय गणेशोत्सव का शांतिपूर्ण समापन हो गया है। नदी तट पर पुरोहितों के मार्गदर्शन में हवन और पूजन के बाद जब प्रतिमाओं को जल में समर्पित किया गया तो उपस्थित जनसमूह ने आंखें नम करके बप्पा से अगले वर्ष पुनः पधारने की प्रार्थना की। इस प्रकार के बड़े आयोजनों के सफलतापूर्वक संपन्न हो जाने से जिला प्रशासन और पुलिस विभाग ने भी राहत की सांस ली है क्योंकि भारी भीड़भाड़ वाले इन आयोजनों में यातायात प्रबंधन और सुरक्षा सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती होती है। त्योहार के शांतिपूर्ण बीत जाने से स्थानीय नागरिकों और व्यापारिक मंडलों में भी काफी संतोष का माहौल है। अब लोग इस उत्सव की सुखद स्मृतियों को संजोते हुए आगामी त्योहारों जैसे कि दशहरा और दीपावली की तैयारियों में जुट गए हैं, जो आने वाले महीनों में समाज में एक बार फिर से नई ऊर्जा और उत्साह का संचार करने का कार्य करेंगे।