अश्विन मास की चतुर्थी तिथि और पंचांग विवरण
पंचांग की गणना के अनुसार आगामी 30 सितंबर 2026 को बुधवार का दिन है और इस तिथि पर अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का प्रभाव रहेगा। धार्मिक दृष्टिकोण से इस विशेष दिन पर कई तरह के ज्योतिषीय और खगोलीय संयोग बन रहे हैं जो इस दिवस को बेहद खास बनाते हैं। इस पूरे दिन भरणी नक्षत्र और वज्र योग का शक्तिशाली प्रभाव देखने को मिलेगा, जिससे इस अवधि में किए जाने वाले धार्मिक कार्यों का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। इसके अलावा मेष चंद्र राशि की स्थिति इस पूरे दिन लोगों के भीतर विशेष प्रकार का उत्साह और सक्रियता बनाए रखने का स्पष्ट संकेत देती है। इस प्रकार पंचांग के ये सभी प्रमुख घटक मिलकर इस संपूर्ण दिवस को आत्मचिंतन और पारंपरिक अनुष्ठानों के लिए अनुकूल बनाते हैं। श्रद्धालु इस दिन सुबह से ही अपनी पारंपरिक दिनचर्या के अनुसार धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए पूरी तरह से तैयार रहते हैं।
पूजन सामग्री और विभिन्न शुभ-अशुभ मुहूर्त
इस विशिष्ट दिवस पर पूजा-पाठ और दान करने के लिए विभिन्न प्रकार के मुहूर्त और काल निर्धारित किए गए हैं जिनका पालन करना कई लोगों के लिए आवश्यक माना जाता है। दिन के समय शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 26 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 12 मिनट तक प्रभावी रहेगा। इसके विपरीत राहुकाल का समय सुबह 11 बजकर 49 मिनट से दोपहर 1 बजकर 18 मिनट तक रहेगा जिसके दौरान किसी भी नए या शुभ कार्य की शुरुआत करने से बचा जाता है। गुलिक काल की अवधि सुबह 10 बजकर 19 मिनट से शुरू होकर सुबह 11 बजकर 49 मिनट तक तय की गई है। यमघण्ट काल का समय सुबह 7 बजकर 20 मिनट से सुबह 8 बजकर 50 मिनट तक का रहेगा। सूर्योदय ठीक सुबह 5 बजकर 50 मिनट पर होगा जबकि सूर्यास्त शाम को 5 बजकर 47 मिनट पर निर्धारित किया गया है। इसके अलावा चंद्रमा के उदय होने का समय रात 8 बजकर 11 मिनट और चंद्रास्त का समय सुबह 9 बजकर 21 मिनट पर तय किया गया है।
पितृ पक्ष और पूर्वजों के स्मरण का महत्व
अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का पितृ पक्ष के पवित्र दिनों के दौरान पड़ना इस कालखंड को अत्यंत महत्वपूर्ण और श्रद्धा से परिपूर्ण बनाता है। इस समयावधि में लोग अपने दिवंगत पूर्वजों का पूरी निष्ठा के साथ स्मरण करते हैं तथा उनकी आत्मा की शांति के लिए तर्पण और दान-पुण्य जैसे कार्य करते हैं। चूंकि यह विशिष्ट दिन बुधवार के पावन वार को पड़ रहा है इसलिए विघ्नहर्ता भगवान गणेश की आराधना करने का भी विशेष विधान और महत्व माना गया है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार यदि इस दिन कोई भी व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और पूरी तरह से शांत मन के साथ धार्मिक कृत्यों को संपन्न करता है तो उससे उसके पूरे परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसके साथ ही घर-परिवार के भीतर मानसिक शांति भी स्थायी रूप से बनी रहती है जो जीवन को सुखमय बनाने में सहायक होती है।