पारंपरिक विधि-विधान से संपन्न हुआ पावन जलविहार अनुष्ठान भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी जल झूलनी एकादशी के इस पावन अवसर पर स्थानीय श्रद्धालुओं ने पारंपरिक मान्यताओं और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विशेष धार्मिक अनुष्ठानों को पूर्ण निष्ठा के साथ संपन्न किया। मंदिरों से भगवान श्री कृष्ण और अन्य आराध्य देवों की सुंदर और सजी हुई मूर्तियों को विमान और पालकियों में सुसज्जित कर भव्य शोभायात्रा के रूप में निकटवर्ती जलाशयों और सरोवरों तक ले जाया गया। इस दौरान वातावरण पूरी तरह से भक्तिमय नजर आया और श्रद्धालुओं ने ढोल-नगाड़ों की गूंज तथा पारंपरिक भजनों के बीच अपने आराध्य का स्वागत किया। जलाशय के तट पर पहुंचने के बाद देवताओं की मूर्तियों को विधि-विधान से स्नान कराकर जलविहार कराया गया, जिसे देखने के लिए दूर-दराज से सैंकड़ों की संख्या में पुरुष, महिलाएं और बच्चे उपस्थित रहे। अनुष्ठान के दौरान सुरक्षा और शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्थानीय लोगों ने भी पूरा सहयोग दिया और सभी कार्यक्रम अत्यंत शांतिपूर्ण तथा अनुशासन के साथ संपन्न हुए।
सनातन संस्कृति में जल झूलनी एकादशी का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व सनातन पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को डोल ग्यारस या जल झूलनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, जिसका हिंदू धर्म में अत्यंत विशिष्ट स्थान है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा की जाती है और व्रत रखने से समस्त पापों का नाश तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस विशेष पर्व पर भगवान को नींद से करवट बदलने वाला दिन भी माना जाता है, इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी के रूप में भी अनुष्ठानित किया जाता है। ग्रामीण और शहरी दोनों ही अंचलों में इस पर्व को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिलता है जहां स्थानीय मंदिर समितियों और समुदाय के लोग मिलकर कई दिनों पहले से ही तैयारियों में जुट जाते हैं। मूर्तियों का जलविहार कराना इस बात का प्रतीक है कि प्रकृति और जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है, और हमारे सभी उत्सव सीधे तौर पर प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने से जुड़े हुए हैं। इस प्रकार के धार्मिक आयोजन नई पीढ़ी को अपनी प्राचीन संस्कृति, परंपराओं और सामूहिक भाईचारे से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम बनते हैं।
धार्मिक आयोजनों से समाज में बढ़ती है आपसी सौहार्द की भावना इस प्रकार के विशाल धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से स्थानीय समुदाय में आपसी प्रेम, भाईचारे और सौहार्द की भावना को अत्यधिक मजबूती मिलती है। जब विभिन्न मोहल्लों और बस्तियों के लोग एक साथ मिलकर इस तरह के पर्वों को मनाते हैं, तो समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से प्रेरणा मिलती है। आयोजनों के समापन के बाद प्रसाद वितरण और भंडारे जैसे कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता है, जिसमें सभी वर्ग के लोग बिना किसी भेद-भाव के हिस्सा लेते हैं। स्थानीय बुद्धिजीवियों और वरिष्ठ नागरिकों का मानना है कि भागदौड़ भरी आज की जीवनशैली में ऐसे पर्व हमारे मानसिक तनाव को कम करने और आत्मिक शांति प्राप्त करने का बेहतरीन अवसर प्रदान करते हैं। भविष्य में भी इस प्रकार की परंपराओं को पूरी भव्यता और उत्साह के साथ जारी रखने का संकल्प स्थानीय समितियों द्वारा लिया गया है ताकि हमारी संस्कृति की यह अनमोल धारा निरंतर आगे बढ़ती रहे।