एकादशी व्रत की तिथि और महत्व
सनातन परंपरा में आश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का विशेष स्थान है, जिसे इंदिरा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस वर्ष यह तिथि मंगलवार, 6 अक्टूबर को पड़ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूरे वर्ष में कुल 24 एकादशियाँ आती हैं, जिनमें से पितृ पक्ष में पड़ने वाली यह एकादशी अत्यंत पुण्यदायी मानी गई है। इस दिन श्रद्धालु विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करते हैं और अपने दिवंगत पूर्वजों को याद कर उनके निमित्त तर्पण एवं दान जैसे धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत के पालन से व्रती को तो पुण्य लाभ मिलता ही है, साथ ही पितरों को भी मोक्ष और शांति प्राप्त होती है। जो परिवार पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध कर्म कर रहे हैं, उनके लिए इस दिन का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि यह आस्था और कृतज्ञता व्यक्त करने का एक अनूठा अवसर प्रदान करता है।
पूजा पद्धति और व्रत के नियम
इंदिरा एकादशी व्रत के नियमों का पालन दशमी तिथि की रात से ही शुरू हो जाता है, जब व्रती को हल्का और सात्विक आहार ग्रहण करना चाहिए। एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करना अनिवार्य है। इसके पश्चात भगवान विष्णु का पूजन कर व्रत का संकल्प लिया जाता है, जिसमें श्रद्धालु अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार निर्जल या फलाहार लेकर व्रत रख सकते हैं। इस दौरान अनाज, सामान्य नमक, चावल और दाल का सेवन करना वर्जित माना गया है। पूजन के समय भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करना, विशेषकर विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अत्यंत लाभकारी होता है। श्रद्धालु 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का उच्चारण करते हुए श्रीहरि की स्तुति करते हैं। शहर के विभिन्न विष्णु मंदिरों और खाटू श्याम मंदिरों में भी इस अवसर पर विशेष धार्मिक आयोजन किए जाएंगे, जहाँ भक्त एकत्रित होकर सामूहिक प्रार्थना और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करेंगे।
व्रत पारण का समय और विधान
इंदिरा एकादशी का समापन अगले दिन यानी 7 अक्टूबर को द्वादशी तिथि में होगा। व्रत का पारण करने के लिए सूर्योदय के बाद का समय निर्धारित किया गया है, जो सुबह 6.18 बजे से लेकर 8.38 बजे तक रहेगा। धार्मिक परंपरा के अनुसार, पारण करने से पहले भगवान विष्णु को भोग अर्पित करना शुभ माना जाता है। भोग लगाने के उपरांत ही भक्त जल और फल ग्रहण कर अपना व्रत पूर्ण करते हैं। यदि किसी व्यक्ति के घर में किसी पितृ का श्राद्ध भी इसी दिन पड़ रहा हो, तो उसे श्राद्ध की विधियों और एकादशी व्रत के नियमों के बीच समन्वय स्थापित करते हुए दोनों परंपराओं का पालन करना चाहिए। संक्षेप में कहें तो इंदिरा एकादशी का संदेश परिवार की आस्था और पूर्वजों के प्रति सम्मान का संगम है। यह पवित्र दिन भगवान विष्णु की भक्ति के साथ-साथ अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक माध्यम है, जिससे परिवार के सभी सदस्यों को आध्यात्मिक शांति और सद्गति की कामना पूर्ण होने का विश्वास मिलता है।