जितिया व्रत में नोनी साग खाने का धार्मिक महत्व सनातन संस्कृति और लोक परंपराओं में जितिया व्रत का अत्यंत विशिष्ट स्थान माना जाता है, जिसे माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और उज्जवल भविष्य की कामना के लिए अत्यंत निष्ठा के साथ रखती हैं। इस कठिन निर्जला व्रत के दौरान विभिन्न प्रकार के नियमों का पालन करना होता है और खानपान को लेकर विशेष सतर्कता बरती जाती है। पर्व के दौरान नोनी के साग का सेवन करने की परंपरा बहुत पुरानी है और इसे अत्यंत शुभ माना गया है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि व्रत के विभिन्न चरणों में इस विशेष साग को खाने से पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है और व्रत रखने वाली महिलाओं को मानसिक शांति मिलती है। ग्रामीण अंचलों से लेकर शहरी क्षेत्रों तक इस परंपरा का पूरी श्रद्धा के साथ पालन किया जाता है और बुजुर्ग महिलाएं नई पीढ़ी को इसके महत्व के बारे में विस्तार से बताती हैं। आने वाली 3 अक्टूबर को आयोजित होने वाले इस उत्सव को लेकर व्रतियों में अभी से भारी उत्साह देखा जा रहा है और बाजारों में इसकी तैयारियों से जुड़ा माहौल नजर आने लगा है।
आगामी 3 अक्टूबर के शुभ मुहूर्त और व्रत की रूपरेखा पंचांग की गणना के अनुसार इस वर्ष जितिया व्रत का पावन अवसर 3 अक्टूबर को पड़ रहा है, जिसको लेकर ज्योतिषविदों और पंडितों द्वारा शुभ मुहूर्तों की घोषणा कर दी गई है। इस दिन माताएं सुबह से ही बिना जल और अन्न ग्रहण किए व्रत का आरंभ करती हैं और अपनी संतानों की रक्षा के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती हैं। व्रत की शुरुआत से पहले नहाय-खाय की परंपरा निभाई जाती है, जिसमें शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है। इस व्रत का अनुष्ठान तीन दिनों तक चलता है जिसमें स्नान, पूजा, कथा श्रवण और पारण का अलग-अलग समय निर्धारित होता है। सही समय पर पूजा संपन्न करने से व्रत का पूरा फल मिलता है और किसी भी प्रकार की त्रुटि से बचा जा सकता है। परिवार के सभी सदस्य मिलकर इस पर्व की तैयारियों में जुट जाते हैं और बड़े-बुजुर्गों के मार्गदर्शन में सभी अनुष्ठान पूरे किए जाते हैं। इस दौरान आस-पास के मंदिरों और घरों में धार्मिक माहौल बन जाता है और लोग व्रत की कथा सुनने के लिए एकत्र होते हैं।
नोनी साग के औषधीय गुण और स्वास्थ्य से जुड़े लाभ धार्मिक मान्यताओं के अलावा नोनी के साग का सेवन स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बेहद फायदेमंद माना गया है, जिसके कारण प्राचीन काल से ही इसे आहार में शामिल किया जाता रहा है। आयुर्वेद के जानकारों का मानना है कि इस प्रकार की पत्तेदार सब्जियों में प्रचुर मात्रा में पोषक तत्व, विटामिन और खनिज पाए जाते हैं जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाते हैं। लंबे समय तक उपवास रखने के बाद शरीर को ऊर्जा और सही पोषण की आवश्यकता होती है, ऐसे में इस साग का सेवन पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने में मदद करता है। आधुनिक दौर में भी लोग स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होकर इन पारंपरिक व्यंजनों को अपना रहे हैं क्योंकि इनसे शरीर को कोई नुकसान नहीं होता बल्कि कई प्रकार की शारीरिक समस्याओं से राहत मिलती है। डॉक्टर और पोषण विशेषज्ञ भी उपवास के दौरान ऐसे प्राकृतिक और पौष्टिक आहार लेने की सलाह देते हैं जो आसानी से पच जाएं। इस प्रकार जितिया व्रत केवल आस्था का प्रतीक नहीं है बल्कि यह हमारे पूर्वजों की ऐसी जीवनशैली को भी दर्शाता है जो स्वास्थ्य और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने की प्रेरणा देती है।