पितृ पक्ष 2026 की अवधि और तिथियों का विशेष गणित साल 2026 में आने वाले पितृ पक्ष को लेकर धार्मिक गलियारों में तैयारियां शुरू हो गई हैं और इस बार यह विशेष अवधि सामान्य दिनों की तुलना में कम यानी चौदह दिनों की ही होगी। पंचांगीय गणनाओं और नक्षत्रों की चाल के कारण इस बार तिथियों का ऐसा संयोग बन रहा है जिससे श्राद्ध का यह पूरा कालखंड चौदह दिनों तक सीमित रहेगा। सनातन धर्म में पूर्वजों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने और उनकी आत्मा की शांति के लिए पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोजन कराने का यह सत्र बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस बार तिथियों के क्षय होने के कारण लोगों को अपनी तिथियों के मिलान में विशेष सावधानी बरतनी होगी ताकि वे अपने दिवंगत परिजनों का श्राद्ध सही दिन और मुहूर्त पर ही संपन्न कर सकें। ज्योतिषीय आचार्यों का ऐसा मानना है कि पंचांग की तिथियों में होने वाले इन उतार-चढ़ाव का सीधा असर व्रत और त्योहारों की गणना पर पड़ता है, जिसके चलते इस बार का यह श्राद्ध काल अपने आप में अलग और अनूठा रहने वाला है।
पितृ दोष से मुक्ति पाने के छह प्रमुख ज्योतिषीय उपाय कुंडली में मौजूद पितृ दोष को जीवन में आने वाली तमाम बाधाओं, असफलताओं और मानसिक अशांति का एक बड़ा कारण माना जाता है जिसे दूर करने के लिए शास्त्रों में कई अचूक उपाय बताए गए हैं। इस विशेष चौदह दिवसीय काल के दौरान कुछ खास अनुष्ठानों और उपायों को अपनाने से पितृ दोष के नकारात्मक प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सबसे पहले, प्रतिदिन दोपहर के समय दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अपने पूर्वजों के नाम से जल में काला तिल मिलाकर तर्पण करना चाहिए और उनकी तस्वीर के सामने घी का दीपक प्रज्वलित करना अत्यंत फलदायी होता है। दूसरा महत्वपूर्ण उपाय यह है कि पीपल के पेड़ की नियमित रूप से पूजा की जाए और उसकी जड़ में जल, दूध व काले तिल अर्पित किए जाएं क्योंकि पीपल को पूर्वजों का वास स्थान माना गया है। तीसरा उपाय जरूरतमंदों और गरीबों को अन्न, वस्त्र तथा उनकी जरूरत का सामान दान करना है, जिससे पितर प्रसन्न होते हैं। चौथा उपाय यह है कि श्राद्ध पक्ष के इन दिनों में किसी योग्य ब्राह्मण को भोजन कराएं और सामर्थ्य के अनुसार दान-दक्षिणा दें। पांचवां उपाय कौवों, कुत्तों और गायों के लिए प्रतिदिन भोजन का कुछ हिस्सा अवश्य निकालना है क्योंकि इन्हें यमराज और पूर्वजों का दूत माना जाता है। छठा और अंतिम प्रमुख उपाय श्रीमद्भागवत गीता के नौवें अध्याय का पाठ करना या किसी पवित्र नदी में स्नान कर अपने पितरों की मुक्ति के लिए सच्चे मन से प्रार्थना करना है।
श्राद्ध पक्ष का धार्मिक महत्व और आगामी धार्मिक तैयारियां हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से आश्विन मास की अमावस्या तक के समय को पितृ पक्ष या महालय के रूप में मनाया जाता है जिसमें लोग अपने पुरखों को याद करते हैं। इस चौदह दिवसीय विशेष अवधि के दौरान देश भर के विभिन्न धार्मिक स्थलों, विशेषकर गया, हरिद्वार, काशी और प्रयागराज जैसे तीर्थों पर पिंडदान करने के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन दिनों में हमारे पूर्वज सूक्ष्म रूप में अपने परिजनों के पास आते हैं और यदि उन्हें श्रद्धापूर्वक अन्न-जल अर्पित किया जाए तो वे पूरे परिवार को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। इस बार अवधि कम होने के बावजूद देश भर के मंदिरों और तीर्थ क्षेत्रों में प्रशासनिक व प्रबंधकीय स्तर पर पुख्ता तैयारियां की जा रही हैं ताकि आने वाले श्रद्धालुओं को किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। ज्योतिषाचार्य और पुरोहित वर्ग भी अपने यजमानों को तिथियों की सही जानकारी देने में जुटे हैं ताकि हर कोई समय रहते अपने पितरों की तृप्ति के लिए आवश्यक अनुष्ठान पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न कर सके।