रामलीला के 25 वें दिन का सजीव मंचन
रामनगर में आयोजित रामलीला के पच्चीसवें दिन राम और रावण के बीच युद्ध का प्रसंग दिखाया गया। अपने बाहुबल से तीनों लोकों को जीतने वाला महापराक्रमी रावण रणक्षेत्र में डटा हुआ था। जब भगवान राम की वानरी सेना का मुकाबला उससे हुआ तो केवल वानर और भालू ही नहीं बल्कि देवता भी मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए। युद्ध के दौरान कई बार रावण के सिर और भुजाएं कटकर अलग हुईं लेकिन वे फिर से जुड़ गईं। लंकापति का ऐसा भयंकर पराक्रम देखकर अशोक वाटिका में बैठी सीता जी की चिंता बढ़ गई। उन्होंने त्रिजटा के पास जाकर पूछा कि आखिर इस महाबली रावण का अंत कैसे होगा और वह किस प्रकार मारा जाएगा। त्रिजटा ने सीता जी को शांत करते हुए पूरी बात समझाई और बताया कि जब रावण की नाभि पर तीर लगेगा तभी उसका वध संभव हो पाएगा। उसी समय कुछ शुभ शकुन हुए जिससे माता सीता को संतोष प्राप्त हुआ और वहीं पर भव्य आरती का आयोजन भी संपन्न हुआ।
युद्ध के मैदान से महल में यज्ञ और देवताओं की घबराहट
रणभूमि से लौटने के बाद रावण सीधे अपने महल में पहुंचा और अनुष्ठान व यज्ञ करने में जुट गया। विभीषण ने तुरंत श्रीराम के पास पहुंचकर इस गुप्त गतिविधि की पूरी सूचना दी। विभीषण ने भगवान राम को चेताया कि यदि रावण का यह यज्ञ पूरी तरह संपन्न हो गया तो उसे पराजित करना असंभव हो जाएगा। इसके बाद श्रीराम के स्पष्ट आदेश पर हनुमान और अंगद अपने कुछ वानर साथियों के साथ रावण के महल में पहुंचे। उन दोनों ने मिलकर रावण का ध्यान पूरी तरह भंग कर दिया जिससे उसका यज्ञ बीच में ही बाधित हो गया। अपनी पूजा टूटने पर रावण ने कई प्रकार की माया रचना शुरू कर दी। श्रीराम ने अपने सटीक बाणों से रावण द्वारा रची गई सभी मायाओं को तुरंत काट दिया। भगवान राम के दिए गए उपदेशों का रावण ने सरेआम उपहास उड़ाया और किसी की बात नहीं मानी। इसके बाद विभीषण और हनुमान ने रावण के साथ सीधे युद्ध किया और उसे चुनौती दी। फिर श्रीराम और रावण के बीच सीधा और अत्यंत भीषण युद्ध शुरू हो गया। उस भयंकर संग्राम को देखकर सभी देवता भयभीत हो गए और अपनी जान बचाने के लिए कंदराओं तथा खोहों में छिपने लगे।
युद्ध समाचार और स्थगित लीला का संपादन
रणभूमि में चल रहे भीषण घटनाक्रम की हर एक खबर अशोक वाटिका तक पहुंचाई जा रही थी। त्रिजटा लगातार वहां बैठकर सीता जी को युद्ध भूमि के ताजा समाचारों से अवगत करा रही थी। सीता जी के बार-बार पूछने पर त्रिजटा ने उन्हें आश्वस्त करते हुए बताया कि रावण का विनाश केवल उसकी नाभि में तीर लगने से ही संभव है। त्रिजटा के इस खुलासे के बाद वहां एक विशेष शकुन हुआ जिससे सीता जी को आंतरिक संतोष और राहत मिली। इसके बाद नियमानुसार वहीं पर आरती का आयोजन किया गया जिसमें सभी लोग सम्मिलित हुए। इस विशेष मंचन से ठीक पहले रविवार के दिन किन्हीं कारणों से स्थगित कर दी गई लीला के प्रसंग को भी समय पर संपादित किया गया। रामनगर की इस ऐतिहासिक रामलीला में रावण के महापराक्रम और उसके अंत की तैयारियों का यह प्रसंग देखने वालों के लिए बहुत ही रोमांचक रहा। कलाकारों ने अपने बेहतरीन अभिनय से उस पौराणिक युद्ध के दृश्यों को पूरी तरह जीवंत कर दिया जिसे देखकर वहां मौजूद दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए।