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धर्म

संतान सप्तमी व्रत: जानिए पूजा में सात अंक और गुड़-आटे के पूए का महत्व

सनातन संस्कृति में संतान सप्तमी व्रत का विशेष स्थान है। इस पावन अवसर पर माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र और उज्जवल भविष्य के लिए कठोर उपवास रखती हैं और विधि-विधान से भगवान शिव तथा माता पार्वती की आराधना करती हैं।

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Ankit Yadav
18 सित 2026, 10:49
संतान सप्तमी व्रत: जानिए पूजा में सात अंक और गुड़-आटे के पूए का महत्व
सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए संतान सप्तमी का व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र माना जाता है। पंचांग के अनुसार यह विशेष पर्व आज मनाया जा रहा है, जिसमें माताएं अपनी संतान के सुखी जीवन, अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करती हैं। इस पावन व्रत के दौरान पूरे दिन कठोर नियमों का पालन किया जाता है और शाम के समय विशेष रूप से भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो माताएं सच्चे मन से यह अनुष्ठान करती हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और संतान को किसी भी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है।

पूजा में सात अंक का रहस्य

इस अनुष्ठान में सात अंक का बहुत बड़ा आध्यात्मिक महत्व माना गया है। पूजन के समय सात गांठों वाला सूत या कलावा हाथ में बांधने की परंपरा है, जो इस व्रत के विधान का मुख्य हिस्सा है। इसके अलावा, प्रसाद के रूप में बनने वाले व्यंजनों में भी इसी संख्या का विशेष ध्यान रखा जाता है। जानकारों के अनुसार यह अंक पूर्णता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है, जो बच्चों के जीवन में स्थिरता और खुशहाली लेकर आता है। इस दिन माताएं अपनी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर संतान की रक्षा का संकल्प लेती हैं और पूरे विधि-विधान के साथ इस परंपरा का निर्वाह करती हैं।

गुड़ और आटे के पूए का भोग

संतान सप्तमी के पावन पर्व पर प्रसाद का भी विशेष महत्व होता है। इस दिन भगवान को विशेष रूप से गुड़ और आटे से तैयार किए गए पूए का भोग लगाया जाता है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, प्रसाद की यह सामग्री शुद्धता और मिठास का प्रतीक है, जिसे बनाने के लिए विशेष नियमों का पालन किया जाता है। पूजा संपन्न होने के बाद इस प्रसाद को परिवार के सदस्यों और जरूरतमंदों में वितरित किया जाता है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और समाज के विभिन्न हिस्सों में इसे पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जाता है। व्रत के समापन पर कथा सुनने का भी विशेष विधान है। ऐसा माना जाता है कि बिना कथा श्रवण किए उपवास का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है। देश के विभिन्न हिस्सों में माताएं मिलकर पूजा करती हैं और कथा का पाठ करती हैं। इस प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान समाज में आपसी सौहार्द और सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे नई पीढ़ी को भी अपनी परंपराओं से जुड़ने का अवसर मिलता है।
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