रामलला के अलौकिक शृंगार का आयोजन
विक्रम संवत 2082 के आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि यानी 18 अक्टूबर को अयोध्या में श्री रामलला का विशेष शृंगार संपन्न हुआ। इस पावन अवसर पर प्रभु के दिव्य स्वरूप को निहारने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु वहां उपस्थित रहे। भगवान श्री रामलला का रोजाना ही अत्यंत भव्य रूप में शृंगार किया जाता है और प्रत्येक दिन उन्हें अलग-अलग प्रकार के वस्त्र धारण कराए जाते हैं। दिल्ली से विशेष रूप से मंगाई गई फूलों की मालाओं से भगवान का शृंगार विशेष आकर्षक बन जाता है। ब्रह्मांड के स्वामी श्री रामलला के दर्शन का सिलसिला प्रतिदिन सुबह के समय से शुरू होकर शाम तक चलता रहता है। भक्तगण भगवान के इन रूपों को देखकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। प्रभु रामलला का दिव्य रूप न केवल स्थानीय लोगों के लिए बल्कि दूर-दराज से आने वाले सभी भक्तों के लिए आस्था और भक्ति का केंद्र बना हुआ है।
नित्य पूजन और आरती की समय-सारिणी
मंदिर में भगवान की दैनिक पूजा प्रक्रिया का आरंभ सुबह 6.30 बजे पहली आरती के साथ होता है। सबसे पहले प्रभु को निद्रा से जगाने की प्रक्रिया संपन्न की जाती है और इसके बाद लेप लगाने से लेकर स्नान तक की विधि पूरी की जाती है। बदलते मौसम के अनुकूल वस्त्रों का चयन किया जाता है, जैसे गर्मियों के दौरान उन्हें हल्के सूती कपड़े पहनाए जाते हैं। दिन भर में चार बार भगवान को भोग लगाने की परंपरा है और मंदिर की अपनी रसोई में ही ये व्यंजन तैयार किए जाते हैं, जो समय के साथ बदलते रहते हैं। दिन की शुरुआत बाल भोग के साथ होती है। दोपहर में 12 बजे मुख्य भोग आरती होती है, जिसके बाद संध्या काल में साढ़े सात बजे संध्या आरती संपन्न की जाती है। भक्तों के लिए दर्शन का समय संध्या 7.30 बजे तक ही निर्धारित किया गया है, जिसके बाद रात 8.30 बजे प्रभु को शयन कराया जाता है।
मंदिर की परंपराएं और दर्शन व्यवस्था
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र में प्रभु श्री रामलला की पूजा-अर्चना पूर्णतः शास्त्रीय विधियों और निर्धारित समय-सारिणी के अनुसार की जाती है। मंदिर प्रशासन ने भक्तों की सुविधा के लिए भोग से लेकर शयन तक की समय सीमा तय कर रखी है। रसोई में हर दिन भगवान के लिए अलग-अलग प्रकार के विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं, जो उनकी रुचि और ऋतु के अनुसार होते हैं। रोजाना सुबह से लेकर रात तक प्रभु के विभिन्न रूपों को निहारना भक्तों के लिए एक अलौकिक अनुभव होता है। फूलों के शृंगार से लेकर वस्त्रों के चयन तक, हर छोटी बात का ध्यान रखा जाता है। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य श्रद्धालुओं को भगवान श्री राम के दिव्य स्वरूप के करीब लाना है। भविष्य में भी यह परंपरा अनवरत जारी रहेगी, जिससे राम मंदिर के दर्शन के लिए आने वाले हर श्रद्धालु को भगवान की अलौकिक आभा का अनुभव निरंतर प्राप्त होता रहेगा और वे आध्यात्मिक शांति प्राप्त कर सकेंगे।