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शुभ संयोग: हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी का पर्व एक ही दिन
इस वर्ष पंचांग के विशेष योग के कारण हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी का पावन पर्व एक ही तिथि पर पड़ रहा है, जिससे देश भर के श्रद्धालुओं में खासा उत्साह देखा जा रहा है।
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Ankit Yadav
13 सित 2026, 15:53
सनातन संस्कृति में पर्वों और त्योहारों का विशेष महत्व होता है, और जब दो बड़े व्रत एक ही दिन पड़ जाएं तो उसका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इस वर्ष ज्योतिषीय गणनाओं और पंचांग के अनुसार, सुहागिनों द्वारा रखे जाने वाले कठिन व्रत हरतालिका तीज और विघ्नहर्ता भगवान गणेश के जन्मोत्सव यानी गणेश चतुर्थी का पर्व एक ही दिन आ रहा है। इस दुर्लभ संयोग के चलते श्रद्धालुओं को एक ही दिन दो बड़े उत्सवों को मनाने का अवसर प्राप्त होगा, जिससे धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-पाठ की तैयारियों में भी तेजी आ गई है।
विशेष धार्मिक संयोग और महत्व
देश भर के मंदिरों और घरों में इस एक ही दिन पड़ने वाले दोहरे उत्सव को लेकर विशेष तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। लखनऊ, बिहार और दिल्ली समेत देश के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं और परिवारों द्वारा इस विशेष तिथि को लेकर भारी उत्साह देखा जा रहा है। हरतालिका तीज के दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए निर्जला उपवास रखती हैं, जबकि गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर घरों और पंडालों में भगवान गणेश की मूर्तियों की स्थापना की जाती है। एक ही दिन इन दोनों प्रमुख व्रतों के आने से बाजारों में भी खासी रौनक देखने को मिल रही है, जहां पूजा सामग्री, फल, फूलों और भगवान गणेश की प्रतिमाओं की खरीदारी के लिए खरीदार पहुंच रहे हैं।
धार्मिक जानकारों और पंडितों के अनुसार, ऐसा संयोग कई वर्षों के बाद बनता है जब तिथि के घटने-बढ़ने या पंचांग की विशेष स्थिति के कारण दो बड़े व्रत एक ही दिन आ जाते हैं। इस स्थिति में श्रद्धालुओं को प्रातःकाल हरतालिका तीज की कथा सुनने और शिव-पार्वती की पूजा करने के साथ-साथ मध्याह्न या शुभ मुहूर्त में भगवान गणेश की स्थापना और पूजा का विधान पूर्ण करना होगा। दोनों ही व्रतों का अपना अलग पौराणिक और सांस्कृतिक महत्व है, इसलिए इस दिन का हर एक पल बेहद पवित्र माना जा रहा है। देश के विभिन्न धार्मिक संगठनों और मंदिरों के कमेटियों द्वारा इस दोहरे पर्व को लेकर विशेष आयोजनों और अनुष्ठानों की रूपरेखा तैयार की जा रही है, ताकि भक्तजन बिना किसी असुविधा के दोनों पर्वों की विधिवत पूजा संपन्न कर सकें।
पारिवारिक दृष्टिकोण से भी यह दिन बेहद आनंददायक रहने वाला है क्योंकि एक तरफ जहां घरों में सुहागिनों द्वारा पारंपरिक गीत गाए जाएंगे और व्रत की कथा पढ़ी जाएगी, वहीं दूसरी तरफ 'गणपति बप्पा मोरया' के जयकारों से पूरा वातावरण गूंज उठेगा। सुरक्षा और व्यवस्था के लिहाज से भी स्थानीय प्रशासन और मंदिर समितियों ने बड़े आयोजनों वाले स्थलों पर विशेष तैयारियां की हैं ताकि उमड़ने वाली भीड़ को नियंत्रित किया जा सके। कुल मिलाकर, यह दुर्लभ खगोलीय और पंचांगीय संयोग सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए एक अत्यंत मंगलकारी और उत्साहवर्धक अवसर लेकर आया है, जिसका पर्वतीय उल्लास आने वाले दिनों तक छाया रहेगा।