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धर्म

तीज व्रत परंपरा: छत्तीसगढ़ में 'करू-भात' खाकर महिलाएं रखती हैं निर्जला उपवास

छत्तीसगढ़ में हरतालिका तीज के पावन अवसर पर महिलाओं ने पूरी निष्ठा और पारंपरिक अनुष्ठान के साथ कठिन निर्जला व्रत की शुरुआत की है, जिसमें करू-भात खाने की परंपरा का विशेष महत्व है।

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Ankit Yadav
13 सित 2026, 12:01
तीज व्रत परंपरा: छत्तीसगढ़ में 'करू-भात' खाकर महिलाएं रखती हैं निर्जला उपवास
छत्तीसगढ़ और आसपास के ग्रामीण अंचलों में हरतालिका तीज का पर्व बेहद धूमधाम और पारंपरिक श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। इस विशेष पर्व के अवसर पर राज्य भर की सुहागिन महिलाओं ने कठोर नियमों का पालन करते हुए निर्जला उपवास रखा है। तीज के इस पावन व्रत की शुरुआत एक खास परंपरा के साथ होती है, जिसे स्थानीय भाषा में करू-भात कहा जाता है। इस अनुष्ठान के तहत महिलाएं व्रत से ठीक पहले या उसके आरंभिक चरण में करेले या अन्य कड़वी चीजों से बने व्यंजनों का सेवन करती हैं, जिसका सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से बहुत गहरा अर्थ होता है।

परंपराओं का निर्वहन और सांस्कृतिक महत्व

छत्तीसगढ़ की संस्कृति में तीज के त्योहार का एक अलग ही स्थान है, जहां पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं को आज भी पूरी शिद्दत के साथ निभाया जाता है। 'करू-भात' खाने की प्रथा के पीछे यह मान्यता है कि जीवन में आने वाले दुखों और कड़वाहट को सहन करने की शक्ति ईश्वर महिलाओं को प्रदान करें। यह एक प्रकार का आत्म-संयम और त्याग का प्रतीक है, जो कठिन व्रतों की श्रृंखला में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। महिलाएं इस दिन सुबह से ही स्नान-ध्यान कर सोलह श्रृंगार करती हैं और भगवान शिव तथा माता पार्वती की पूजा-अर्चना की तैयारी में जुट जाती हैं। निसंदेह यह पर्व परिवार की सुख-समृद्धि और पति की लंबी उम्र के लिए रखा जाने वाला एक अत्यंत कठिन व्रत है। निर्जला रहने के कारण यह शारीरिक रूप से भी काफी चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन महिलाओं की आस्था और भक्ति इस कड़े उपवास को बेहद सहज बना देती है। घरों में उत्साह का माहौल होता है और पारंपरिक लोकगीतों की गूंज सुनाई देती है। कुंवारी कन्याएं भी अच्छे वर की कामना के लिए इस व्रत को रखती हैं, जिससे समाज में आपसी भाईचारा और सांस्कृतिक एकता और अधिक मजबूत होती है। त्योहार के इस अवसर पर बाजारों में भी खासी रौनक देखने को मिलती है, जहां पूजन सामग्री, श्रृंगार का सामान और नए वस्त्रों की खरीदारी के लिए महिलाओं की भारी भीड़ उमड़ती है। बुजुर्ग महिलाएं अपनी बहुओं और बेटियों को इस व्रत के नियमों और संस्कृति की बारीकियों से अवगत कराती हैं, ताकि यह विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंच सके। छत्तीसगढ़ की यह अनूठी परंपरा आधुनिक दौर में भी अपनी जड़ों से पूरी तरह जुड़ी हुई है और हर साल समाज को एक नए सांस्कृतिक सूत्र में पिरोती है।
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