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धर्म

उत्सव का संदेश: विजयदशमी असत्य पर सत्य की शाश्वत विजय का प्रतीक है धामी

असत्य पर सत्य की जीत के पर्व विजयदशमी के अवसर पर महत्वपूर्ण संदेश सामने आया है। इस पावन पर्व को लेकर समाज में प्रेरणा का प्रसार करने पर विशेष जोर दिया गया है।

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Ankit Yadav
20 अक्ट 2026, 16:32
उत्सव का संदेश: विजयदशमी असत्य पर सत्य की शाश्वत विजय का प्रतीक है धामी

विजयदशमी पर्व का मूल संदेश

अन्याय और अधर्म के ऊपर हमेशा न्याय तथा धर्म की विजय होती है। यह बात विजयदशमी पर्व के संदर्भ में कही गई है जो कि असत्य पर सत्य की जीत का बड़ा प्रतीक माना जाता है। इस विशेष दिन पर लोगों को यह प्रेरणा मिलती है कि वे अपने जीवन में हमेशा सच्चाई के मार्ग पर चलें और किसी भी प्रकार की बुरी ताकतों या बुराइयों का डटकर मुकाबला करें। समाज में इस त्योहार का बहुत बड़ा धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है क्योंकि यह प्राचीन काल से चली आ रही परंपराओं को जीवित रखता है और आने वाली पीढ़ियों को अच्छे संस्कार प्रदान करने का कार्य करता है। त्योहार के इस पावन अवसर पर चारों ओर उल्लास का वातावरण देखने को मिलता है और लोग एक दूसरे को बधाई देते हैं। हर कोई इस बात को मानता है कि अच्छाई की जीत हमेशा सुनिश्चित होती है चाहे रास्ते में कितनी भी मुश्किलें क्यों न आएं।

धामी द्वारा दिया गया विचार

इस अवसर पर धामी ने अपने विचार साझा करते हुए विजयदशमी पर्व के महत्व को रेखांकित किया है। उन्होंने बताया कि यह पर्व हमें सिखाता है कि अहंकार और बुराई का अंत निश्चित होता है। उनके अनुसार इस प्रकार के सांस्कृतिक और पारंपरिक पर्व हमारी संस्कृति की असली ताकत हैं जो देश के नागरिकों को आपस में जोड़कर रखते हैं। समाज के प्रत्येक वर्ग के लोगों को इन त्योहारों से प्रेरणा लेनी चाहिए और अपने व्यक्तिगत जीवन में भी उच्च आदर्शों को अपनाना चाहिए। उत्सव का यह पावन दिन हर व्यक्ति को यह सोचने का अवसर देता है कि वह अपनी कमियों को दूर करके एक बेहतर इंसान कैसे बन सकता है। इस प्रकार के संदेश समाज में सकारात्मकता फैलाने का कार्य करते हैं और लोगों को एक नई दिशा दिखाते हैं जिससे आपसी भाईचारा और सद्भाव बढ़ता है।

सनातन संस्कृति और पृष्ठभूमि

भारतीय सनातन संस्कृति में विजयदशमी या दशहरा पर्व का इतिहास बहुत पुराना और गौरवशाली रहा है। यह पर्व बुराई के प्रतीक पुतलों के दहन और असत्य पर हुई ऐतिहासिक जीत की याद दिलाता है। परंपरा के अनुसार यह दिन असत्य के विनाश और धर्म की स्थापना का प्रतीक है जो प्राचीन कथाओं से जुड़ा हुआ है। इस प्रकार के आयोजनों से न केवल धार्मिक भावनाएं मजबूत होती हैं बल्कि सांस्कृतिक एकता भी स्थापित होती है। आधुनिक समय में भी इन पर्वों का महत्व कम नहीं हुआ है बल्कि इनका दायरा और अधिक व्यापक हो गया है। लोग पूरे उत्साह के साथ इन आयोजनों में भाग लेते हैं और अपनी पुरानी परंपराओं को आगे बढ़ाते हैं। समाज के लिए यह जरूरी है कि वह अपनी संस्कृति की इन महान जड़ों को पहचाने और आने वाले समय में भी इनका पालन करता रहे ताकि हमारी पहचान हमेशा सुरक्षित बनी रहे।

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