पंडालों में गूंजती खास ध्वनि
पश्चिम बंगाल में मनाए जाने वाले दुर्गा पूजा महोत्सव के दौरान एक विशिष्ट आवाज बार-बार गूंजती है। पूजा पंडालों में जब भी माता की आरती का समय आता है या फिर सिंदूर खेला तथा देवी की विदाई का अवसर होता है, तब वहां मौजूद महिलाएं एक अनोखा तरीका अपनाती हैं। वे अपनी जीभ को बहुत तेजी से आगे-पीछे हिलाती हैं जिसके परिणामस्वरूप एक विशेष और ऊंची लहराती हुई ध्वनि उत्पन्न होती है। स्थानीय संस्कृति में इस अनूठी परंपरा को उलू ध्वनि या उलुध्वनि के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजी भाषा में इस क्रिया को उलुएशन भी कहा जाता है। इस आवाज की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि इसके निर्माण के लिए किसी भी प्रकार के वाद्य यंत्र की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती है। केवल महिलाओं की आवाज के माध्यम से ही संपूर्ण पंडाल में उत्सव का जीवंत और ऊर्जावान माहौल बन जाता है जब कई महिलाएं एक साथ इस ध्वनि को निकालती हैं।
खुशी और परंपरा का प्रतीक
बंगाल की सांस्कृतिक विरासत में इस पारंपरिक ध्वनि को प्रसन्नता, अच्छे दिनों की शुरुआत और धार्मिक उत्साह के साथ जोड़कर देखा जाता है। यह परंपरा केवल दुर्गा पूजा के दिनों तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसका दायरा बहुत बड़ा है। बंगाली परिवारों में जब भी कोई मांगलिक कार्य संपन्न होता है, तब महिलाएं इस ध्वनि को अवश्य निकालती हैं। नवजात शिशु के जन्म लेने पर, विवाह समारोहों के दौरान और नए घर में प्रवेश करने के समय यानी गृह प्रवेश के मौकों पर भी इसका विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है। इस आवाज को निकालने का उद्देश्य अपनी खुशियों को खुलकर व्यक्त करना और किसी भी महत्वपूर्ण पल को हमेशा के लिए यादगार बनाना होता है। धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार इस प्रकार की ध्वनि को अत्यंत शुभ माना जाता है। कुछ सांस्कृतिक विश्वासों में इसे बुरी और नकारात्मक ताकतों से बचाव का साधन भी माना गया है जिसके जरिए मंगल कामना की जाती है। हालांकि यह पूरी तरह से सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताएं हैं जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं।
व्यापक सांस्कृतिक महत्व
उलू ध्वनि निकालने की यह प्रथा सिर्फ पश्चिम बंगाल की भौगोलिक सीमाओं तक ही सीमित नहीं है। भारत के कुछ अन्य राज्यों में भी अलग-अलग नामों से ऐसी ही आवाजें निकालने की प्राचीन परंपराएं आज भी जीवित हैं। जब दुर्गा पूजा का उत्सव अपनी चरम सीमा पर होता है, तब ढाक की पारंपरिक थाप, पवित्र शंख की गूंज और महिलाओं द्वारा निकाली जाने वाली उलू ध्वनि मिलकर एक ऐसा अद्भुत वातावरण तैयार करती हैं जो इस पर्व को एक अनूठी पहचान प्रदान करता है। धार्मिक अनुष्ठानों और आयोजनों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी का यह एक बहुत ही सशक्त सांस्कृतिक रूप माना जाता है। हालांकि कुछ धार्मिक व्याख्याओं के दौरान इस ध्वनि को अलग-अलग देवी-देवताओं तथा मंत्रों से भी जोड़ा जाता है, परंतु इसके हर अंश को राधा और कृष्ण के नाम का प्रतीक बताने वाले तर्कों की पुष्टि के लिए कोई भी भरोसेमंद ऐतिहासिक या धार्मिक स्रोत उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे इस पारंपरिक प्रथा का स्थापित और अंतिम अर्थ मानना पूरी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता है। इस ध्वनि की असली ताकत बंगाल की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान में निहित है।