प्रैक्टिकल परीक्षा के नए नियम और छात्रों की चुनौती
कानपुर नगर में हाईस्कूल स्तर पर विज्ञान और गृह विज्ञान विषयों की प्रैक्टिकल परीक्षा को लेकर अनिश्चितता का माहौल है। उप्र माध्यमिक शिक्षा परिषद ने इस चालू शैक्षिक सत्र 2026-27 के लिए आंतरिक मूल्यांकन की व्यवस्था को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। अब 15 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद, छात्रों को बाहरी एग्जामिनर के सामने अपनी दक्षता साबित करनी होगी। यह स्थिति उन स्कूलों के लिए बेहद चिंताजनक है जहां विज्ञान और कला प्रयोगशालाओं की सुविधा पूरी तरह से नदारद है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जीआईसी चुन्नीगंज, जीजीआईसी विजय नगर और जीआईसी भौती जैसे कई पुराने संस्थानों में भी वर्तमान में लैब की सुविधा उपलब्ध नहीं है। ऐसे में 46,013 पंजीकृत छात्र-छात्राओं के सामने हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने का सीधा संकट उत्पन्न हो गया है। छात्रों को डर है कि यदि बाहर से आने वाले सख्त एग्जामिनर ने लैब के अभाव में परीक्षा ली, तो उनका शैक्षणिक परिणाम खराब हो सकता है।
एग्जामिनर की मेहरबानी पर निर्भर होगा भविष्य
जिले में माध्यमिक शिक्षा परिषद से मान्यता प्राप्त 692 स्कूलों में से लगभग 90 प्रतिशत संस्थानों के पास विज्ञान और गृह विज्ञान की लैब मौजूद हैं, लेकिन बाकी स्कूलों की स्थिति बदतर है। पहले छात्र अपने शिक्षकों के भरोसे आंतरिक मूल्यांकन के माध्यम से प्रैक्टिकल में उत्तीर्ण हो जाते थे, जिससे लैब की कमी कभी बाधा नहीं बनी। अब चूंकि एग्जामिनर 100 से 200 किलोमीटर की दूरी तय करके परीक्षा लेने आएंगे, इसलिए छात्रों का भविष्य पूरी तरह से उनकी मेहरबानी पर निर्भर हो गया है। जिलों में ज्यादातर लैब अटेंडेंट के पद भी लंबे समय से रिक्त पड़े हैं, जिससे अव्यवस्था और बढ़ गई है। शिक्षा विभाग ने सभी स्कूलों को प्रैक्टिकल की तैयारी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं और स्पष्ट कर दिया है कि जिन स्कूलों में अभी तक लैब नहीं है, उन्हें इसे जल्द से जल्द व्यवस्थित करना होगा। शिक्षकों की भूमिका अब केवल एक मार्गदर्शक की रह जाएगी, जबकि परीक्षा के अंक बाहरी परीक्षक के हाथ में होंगे।
लैब की कमी का पुराना इतिहास और वर्तमान समस्या
कानपुर नगर के स्कूलों में लैब की यह कमी रातों-रात पैदा नहीं हुई है, बल्कि 2011-12 के बाद से यह समस्या धीरे-धीरे गंभीर होती गई। उस दौर में आंतरिक मूल्यांकन की व्यवस्था ने स्कूलों को लैब के रखरखाव के प्रति उदासीन बना दिया था। जीआईसी चुन्नीगंज जैसे ऐतिहासिक स्कूल, जिनकी मान्यता 1910 में मिली थी, आज भी बुनियादी विज्ञान और कला प्रयोगशाला सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। यह स्थिति उन सभी स्कूलों के लिए सबक है जिन्होंने पिछले डेढ़ दशक में लैब को नजरअंदाज किया। अब जब बोर्ड ने कड़ा रुख अपनाते हुए बाहरी परीक्षकों को अनिवार्य कर दिया है, तो स्कूलों के पास अपनी सुविधाओं को सुधारने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। आने वाले समय में इन छात्रों का परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि वे बिना लैब के इन विषयों की बारीकियां कितनी समझ पाते हैं। अभिभावक और छात्र अब इस बात को लेकर चिंतित हैं कि क्या स्कूल समय रहते प्रैक्टिकल की व्यवस्था दुरुस्त कर पाएंगे या नहीं।