देशव्यापी सर्वेक्षण में सामने आई जमीनी हकीकत
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर देशभर के विश्वविद्यालयों, आईआईटी, आईआईएम और मेडिकल कॉलेजों के 50 हजार से अधिक विद्यार्थियों पर यह विस्तृत अध्ययन किया गया। समिति ने अपनी रिपोर्ट में रेखांकित किया कि अत्यधिक शैक्षणिक दबाव, भविष्य के करियर की अनिश्चितता और सामाजिक अलगाव के कारण छात्रों में अवसाद के लक्षण तेजी से बढ़ रहे हैं। अधिकांश छात्र अपनी समस्याओं को खुलकर साझा करने में झिझक महसूस करते हैं जिससे स्थिति और गंभीर हो जाती है।
संस्थानों में परामर्श व्यवस्था की भारी कमी
सर्वेक्षण के अनुसार 70 प्रतिशत से अधिक उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिकों और परामर्शदाताओं की स्थाई व्यवस्था नहीं है। समिति ने सिफारिश की है कि प्रत्येक शैक्षणिक परिसर में चौबीसों घंटे काम करने वाले मेंटल हेल्थ वेलनेस सेंटर स्थापित किए जाने चाहिए जहां छात्रों की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाए। साथ ही शिक्षकों और फैकल्टी मेंबर्स को छात्रों में अवसाद के शुरुआती लक्षणों को पहचानने के लिए प्रशिक्षित किया जाना अनिवार्य होना चाहिए।
नीतिगत सुधार और सरकार को सिफारिशें
न्यायालय ने शिक्षा मंत्रालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को इन सिफारिशों के क्रियान्वयन के लिए एक राष्ट्रीय कार्ययोजना बनाने का निर्देश दिया है। अदालत ने टिप्पणी की कि युवाओं का मानसिक स्वास्थ्य राष्ट्र की प्राथमिकता होना चाहिए और शैक्षणिक परिसरों को केवल परीक्षाओं का दबाव बनाने वाले केंद्रों के रूप में नहीं चलने दिया जा सकता। रिपोर्ट पर विस्तृत सुनवाई अगले माह तय की गई है।