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शिक्षा

महंगी शिक्षा का संकट: दो साल की बच्ची के प्रीस्कूल प्रवेश के लिए 1.5 लाख रुपये डोनेशन

देश में बढ़ती स्कूली शिक्षा की लागत और शुरुआती कक्षाओं में दाखिले के नाम पर वसूले जाने वाले भारी डोनेशन ने अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। एक पिता ने अपनी दो साल की बच्ची के प्रीस्कूल में दाखिले के समय मांगी गई डेढ़ लाख रुपये की भारी भरकम राशि पर अपना गहरा दर्द बयां किया है।

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Ankit Yadav
24 सित 2026, 11:29
महंगी शिक्षा का संकट: दो साल की बच्ची के प्रीस्कूल प्रवेश के लिए 1.5 लाख रुपये डोनेशन

शुरुआती कक्षाओं के प्रवेश में भारी भरकम डोनेशन भारतीय शिक्षा व्यवस्था के भीतर शुरुआती दौर की पढ़ाई कितनी महंगी होती जा रही है, इस बात का अंदाजा हाल ही में सामने आए एक मामले से लगाया जा सकता है जहां दो साल की एक छोटी सी बच्ची के प्रीस्कूल में दाखिला कराने के लिए एक लाख पचास हजार रुपये की भारी भरकम डोनेशन की मांग की गई। इस तरह के अजीबोगरीब और अत्यधिक वित्तीय बोझ ने आम परिवारों के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है जहां बच्चे ने अभी ठीक से बोलना और दुनिया को समझना भी शुरू नहीं किया है, उससे पहले ही उसके माता-पिता को भारी मात्रा में पैसों का इंतजाम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। एक पिता ने सार्वजनिक रूप से अपनी इस पीड़ा को साझा करते हुए बताया कि किस प्रकार आज के समय में छोटे बच्चों के शिक्षण संस्थानों में दाखिला पाने की प्रक्रिया केवल पैसों के बल पर ही संभव होती जा रही है और मध्यम वर्ग के लिए यह सब वहन करना लगभग असंभव सा बनता जा रहा है।

बढ़ती व्यावसायिकता और अभिभावकों पर बढ़ता वित्तीय दबाव वर्तमान समय में शिक्षा का क्षेत्र एक बड़े व्यापार का रूप ले चुका है, जिसमें प्रीस्कूल और प्लेस्कूल जैसे शुरुआती संस्थान भी व्यावसायिक लाभ कमाने की अंधी दौड़ में शामिल हो चुके हैं। बच्चे के जन्म के कुछ ही वर्षों के भीतर उसके भविष्य को सुरक्षित करने की होड़ में माता-पिता को महंगे से महंगे संस्थानों का दरवाजा खटखटाना पड़ता है, जहां दाखिले के नाम पर मोटी फीस, पंजीकरण शुल्क और विभिन्न प्रकार के गुप्त फंड्स के रूप में भारी डोनेशन वसूला जाता है। इस प्रकार की व्यावसायिक गतिविधियों के कारण आमदनी के सीमित साधन वाले परिवारों का जीवन और अधिक संघर्षपूर्ण हो जाता है क्योंकि उन्हें अपने बच्चों की बुनियादी और अच्छी परवरिश के लिए अपनी जमापूंजी तक दांव पर लगानी पड़ जाती है। सरकार और शिक्षा बोर्डों द्वारा बनाए गए नियमों के बावजूद कई संस्थान परोक्ष रूप से भारी भरकम रकबा वसूलने के नए-नए रास्ते निकाल लेते हैं, जिस पर प्रभावी नियंत्रण रखना प्रशासन के लिए भी एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है और इसका सीधा नुकसान आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।

भविष्य की चिंता और सुधारात्मक कदमों की आवश्यकता यदि शिक्षण संस्थानों द्वारा इस प्रकार की मनमानी फीस और डोनेशन वसूली पर जल्द ही रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल उच्च आय वाले परिवारों तक ही सीमित रह जाएगी और सामान्य वर्ग के बच्चे अच्छी शुरुआत से वंचित रह जाएंगे। इस घटना के सामने आने के बाद से सोशल मीडिया और विभिन्न नागरिक मंचों पर यह बहस तेज हो गई है कि क्या सरकार को प्रीस्कूल और किंडरगार्टन स्तर की शिक्षा के लिए भी एक समान और सख्त मूल्य नीति निर्धारित करनी चाहिए ताकि कोई भी स्कूल अपनी मर्जी से मनमाने दाम न वसूल सके। अभिभावकों की यह उम्मीद है कि शिक्षा प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेते हुए ऐसी व्यवस्था बनाएगा जिससे हर बच्चे को उसकी आर्थिक स्थिति की बाधा के बिना शुरुआती शिक्षा का समान अवसर मिल सके और माता-पिता को इस तरह के मानसिक तथा आर्थिक शोषण से पूरी तरह मुक्ति मिल सके।

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