आईआईएससी प्रोफेसर ने जताई गंभीर चिंता
भारतीय विज्ञान संस्थान के एक वरिष्ठ प्रोफेसर ने भविष्य में रोजगार के अवसरों को लेकर बहुत बड़ी और गंभीर चेतावनी जारी की है। उन्होंने एक सार्वजनिक मंच पर अपने विचार रखते हुए कहा कि आने वाले 5 वर्षों के भीतर उच्च शिक्षण संस्थानों से कैंपस प्लेसमेंट की व्यवस्था पूरी तरह से बंद हो सकती है। इस अचानक आई बड़ी घोषणा ने देश भर के तकनीकी संस्थानों में पढ़ाई कर रहे लाखों छात्रों की नींद उड़ा दी है। छात्र और उनके अभिभावक इस बात को लेकर बेहद चिंतित हैं कि यदि ऐसा होता है तो डिग्री पूरी होने के बाद उन्हें रोजगार कैसे मिलेगा। प्रोफेसर के इस आकलन ने शिक्षा जगत में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। हर कोई इस बात पर विचार कर रहा है कि आने वाले समय में रोजगार के बाजार का स्वरूप क्या होगा और युवा पीढ़ी अपनी आजीविका कमाने के लिए किस प्रकार के नए विकल्पों की तलाश करेगी। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के प्रशासन भी इस संभावित बड़े बदलाव को लेकर अंदरखाने गंभीर मंथन कर रहे हैं।
नौकरियों पर मंडरा रहे खतरे की मुख्य वजह
नौकरी बाजार में आ रहे इस बड़े बदलाव और खतरे के पीछे कई तकनीकी और आर्थिक कारण छिपे हुए हैं। आधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई का तेजी से बढ़ता हुआ प्रभाव सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है। कंपनियां अब पारंपरिक तरीकों से ग्रेजुएट होने वाले युवाओं को सीधे काम पर रखने के बजाय अत्याधुनिक साफ्टवेयर और ऑटोमेशन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रही हैं। इसके अलावा उद्योग जगत की मांग और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम के बीच एक बहुत बड़ा अंतर लगातार बना हुआ है। तकनीकी कंपनियों का कहना है कि संस्थानों से निकलने वाले छात्र सीधे तौर पर काम करने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं होते हैं। उन्हें नौकरी पर रखने के बाद कंपनियों को उन पर दोबारा भारी भरकम प्रशिक्षण खर्च करना पड़ता है। यही वजह है कि उद्योग जगत अब कैंपस में आकर सीधी भर्तियां करने के पारंपरिक तरीकों से लगातार दूर होता जा रहा है। प्रोफेसर ने अपनी इस टिप्पणी में इन्हीं बदलती हुई औद्योगिक परिस्थितियों और तकनीकी प्रगति को मुख्य आधार बनाया है जो आने वाले दिनों में रोजगार के पूरे परिदृश्य को पूरी तरह से उलट सकती हैं।
शिक्षा प्रणाली और भविष्य के लिए इसका महत्व
कैंपस प्लेसमेंट की व्यवस्था बंद होने की इस आशंका ने देश की पूरी उच्च शिक्षा प्रणाली के सामने एक बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। यदि आगामी 5 वर्षों में यह बात सच साबित होती है तो शिक्षण संस्थानों को अपनी पुरानी शिक्षण शैली को पूरी तरह से बदलना पड़ेगा। विश्वविद्यालयों को केवल किताबी ज्ञान देने के बजाय छात्रों को व्यावहारिक और उद्योग की जरूरत के अनुसार हुनरमंद बनाना होगा ताकि वे खुद अपने लिए काम तलाश सकें। इस बदलाव का असर केवल इंजीनियरिंग या प्रबंधन की पढ़ाई तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि हर प्रकार के उच्च शिक्षण संस्थान इसकी चपेट में आ सकते हैं। छात्रों को अब अपनी पढ़ाई के दौरान ही तकनीकी कौशल, कोडिंग और अन्य व्यावसायिक गुणों में पारंगत होना पड़ेगा तभी वे भविष्य की अनिश्चित दुनिया में टिक पाएंगे। शिक्षाविदों का मानना है कि इस चेतावनी को समय रहते एक चेतावनी के रूप में लिया जाना चाहिए। संस्थानों और नीति निर्माताओं को मिलकर अभी से ऐसी ठोस रणनीतियाँ तैयार करनी होंगी जो आने वाले समय में देश के युवाओं को बेरोजगार होने से बचा सकें और उन्हें नए दौर के रोजगार के अवसरों के लिए पूरी तरह से तैयार कर सकें।